गर्भपात महापाप
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गर्भपात महापाप

 

गर्भपात के समान दूसरा कोई भयंकर पाप है ही नहीं । ''पाराशर स्मृति'' में आया है :

यत्पापं ब्रम्हहत्याया व्दिगुणं गर्भपातने ।

प्रायश्चितं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते ।।

'ब्रम्हहत्या से जो पाप लगता है उससे दुगना पाप गर्भपात करने से लगता है । इस गर्भपातरूप  महापाप का कोई प्रायश्चित भी नहीं है, इसमें तो उस स्त्री का त्याग कर देने का ही विधान है ।'

यदि अन्न पर गर्भपात करनेवाले की दृष्टि भी पड़ जाय तो वह अन्न अभक्ष्य हो जाता है ।

गर्भस्थ शिशु  को अनेक जन्मों का ज्ञान होता है ।इसलिए श्रीमद्भागवत में उसको ऋषि (ज्ञानी) कहा गया है । अत उसकी हत्या से बढ़कर और क्या पाप होगा ?

संसार का कोई भी श्रेष्ठ धर्म गर्भपात को सर्मथन नहीं देता है और ना दे सकता है क्योंकि यह कार्य मनुष्यता के विरूद्ध है । जीवमात्र को जीने का अधिकार है । उसको गर्भ में ही नष्ट करके उसके  अधिकार को छीनना महापाप है । गर्भपात एक जीवित मनुष्य की हत्या है – इस बात को अब विदेशी डॉक्टर भी मानने लगे हैं । उन्होने साइलेंट स्क्रीम (मूक चीख) नाम से गर्भस्थ शिशु की नृशंस हत्या (गर्भपात) दिखानेवाली एक फिल्म भी बना ली है, जिसे संस्था द्वारा समय–समय पर देश भर के विभिन्न स्थानों पर दिखाया जाता है । गर्भ में बालक निर्बल और असहाय अवस्था में रहता है । वह अपने बचाव का कोई उपाय भी नहीं कर सकता तथा अपनी हत्या का प्रतिकार भी नहीं कर सकता । अपनी हत्या से बचने के लिए वह पुकार भी नहीं सकता, रो भी नहीं सकता । उसका कोई अपराध, कसूर भी नहीं है – ऐसी अवस्था में जन्म लेने से पहले ही उस निरपराध, निर्दोष, असहाय बच्चे की हत्या कर देना पाप की, कृतघ्नता की, दुष्टता की, नृशंसता की, क्रूरता की, अमानुषता की, अन्याय की आखिरी हद है । धर्मप्रधान देश भारत में व्यापक  रूप से ऐसे महापाप का होना बड़े ही कलंक की बात है । मुसलमान भाई तो कहते हैं कि संतान होना खुदा का विधान है। उसको बदलने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। जो उसके विधान को बदलते हैं वे अनधिकार चेष्टा करते है। परिवार-नियोजन करनेवालों की संख्या कम हो जाती है । अतः मुसलमानों ने यह सोचा कि परिवार-नियोजन नहीं करेंगे तो अपनी जन-संख्या बढ़ेगी और जन-संख्या बढ़ने से अपना ही राज्य होगा । परंतु हिन्दू केवल अपनी थोड़ी-सी-सुख-सुविधा के लिये नसबन्दी,गर्भपात आदि महापाप करने में लगे हुए हैं । परलोक में इस महापाप का भयंकर दुख भोगना पडेगा । इस तरफ भी उनकी दृष्टि नहीं है। केवल खाने-पीने , सुख भोगने की तरफ तो पशुओं की भी दृष्टि रहती है। अगर यही दृष्टि मनुष्य की भी है तो यह मनुष्यता नहीं है । फ्रांस , इंग्लैण्ड , इटली , स्वीडन आदि देशों ने भी संतति निरोध पर प्रतिबन्ध लगाया । इटली में तो यहाँ तक कानून बना दिया गया कि संतति निरोध का प्रचार एवं प्रसार करनेवाले को एक वर्ष की कैद तथा जुर्माना किया जा सकता है । आश्चर्य की बात है कि परिवार-नियोजन के जिन दुष्परिणामों को पश्चिमी देश भुगत चुके है , उनको देखने के बाद भी भारत सरकार इस कार्यक्रम को बढ़ावा दे रही है ।

विनाशकाले विपरीत बुद्धि !

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