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अगर चाहिए दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न संतान तो इन बातों का रखें विशेष ध्यान
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अगर चाहिए दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न संतान तो इन बातों का रखें विशेष ध्यान

 

इतिहास इस बात का साक्षी है कि माता-पिता के अच्छे संस्कारों, उनके आचरणों, उनकी प्रेरणाओं का प्रभाव बच्चों पर पड़ता है । भरत, ध्रुव , अभिमन्यु, वीर शिवाजी, पूज्य बापूजी आदि सभीके जीवन में उनके माता-पिता के आदर्श आचरणों का प्रबल प्रभाव पड़ा । 


हर माँ-बाप चाहते हैं कि उनकी संतान उनकी अपेक्षा के अनुसार बने परंतु उत्तम संस्कारों के अभाव एवं अश्लीलता फैलानेवाले आधुनिक प्रसार माध्यमों, टीवी चैनलों आदि से मिलनेवाले कुसंस्कारों के प्रभाव में आकर आज की बाल-युवा पीढ़ी का नैतिक पतन होता जा रहा है । खान पान, रहन-सहन, चिंतन-मनन -सभी क्षेत्रों में पाश्चात्य कल्चर हावी होता जा रहा है । कुसंस्कारों की बाढ़ से बचाने हेतु माता को चाहिए कि गर्भ में ही बच्चों को अच्छे संस्कारों से युक्त कर दें ।

सगर्भावस्था के दौरान माता इन बातों का विशेष ध्यान रखें ।  

विज्ञान भी सिद्ध कर रहा है

1. जो महिलाएँ सगर्भावस्था में झगड़े, मार-पीट आदि हिंसक कार्यों में लिप्त रहती हैं, उनके  बच्चों में स्मरणशक्ति की कमी होने की संभावना अधिक रहती है

 

2. जो महिलाएँ सगर्भावस्था में दुःखी अथवा शोकग्रस्त रहती हैं, उनके बच्चे डरपोक, दुर्बल एवं कम उम्रवाले होते हैं ।


3. जो महिलाएँ सगर्भावस्था में अत्याधिक क्रोध करती हैं, उनके बच्चों का स्वभाव क्रुरतावाला बन जाता है, उनमें दूसरों के दोष देखने की प्रवृति आ जाती है  

 

अतः सगर्भावस्था में  सावधानी कितनी जरूरी है, ये तो आप समझ गयी होंगी । अतः आप अपनी दिनचर्या का रोजाना अवलोकन कर उसमें सुधार लायें । तिथि तथा ग्रहण का भी गर्भ पर बड़ा प्रभाव पड़ता है । 


"पूर्णिमा और अष्टमी के दिन चन्द्रकिरणों का विशेष प्रभाव पड़ता है । जो चन्द्र की किरणें सागर को प्रभावित कर सकती हैं, वे किरणें हमारे शरीर के जलीय तत्व और सप्तधातुओं पर भी असर करें, इसमें क्या आश्चर्य है

 

जो लोग वेदव्यासजी के इस दिव्य ज्ञान से वंचित हैं, वे लोग पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि जैसे निषिद्ध दिनों में भी संसार-व्यवहार करते हैं । यदि इन दिनों में गर्भाधान हो जाता है तो संतान विकलांग होगी या किसी-न-किसी व्याधि से ग्रस्त रहेगी । यदि गर्भ नहीं रहा तो भी संसार-व्यवहार करनेवाले दम्पति का स्वास्थ्य व रोगप्रतिकारक शक्ति तो कम हो ही जायेगी । अतः भूलकर भी इन तिथियों में संसार-व्यवहार नहीं करना चाहिए । गलती होती है माँ-बाप की और भुगतता है बच्चा ! फिर माँ-बाप भी परेशान रहते हैं । गर्भवती महिला को तो ग्रहण के समय खास सावधान रहना चाहिए ।

 

        उदाहरण *

 

राजस्थान में खंडेला के एक पंडित ने अपने यजमान की गर्भवती पत्नी से ग्रहण के समय खूब बढ़िया-बढ़िया खाने के लिए कहा । उसने उस नास्तिक पंडित के कहने से खा तो लिया लेकिन उसका बेटा अपंग पैदा हुआ ! अतः सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय इन बातों की सावधानी रखनी चाहिए ।"

 

सगर्भावस्था में माँ को पूरे उत्साह, तत्परता व ध्यानपूर्वक प्रत्येक काम करना चाहिए ताकि आनेवाली संतान सद्गुणों से सम्पन्न हो ।

 

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