बच्चों को संस्कारित करने के सरल तरीके
/ Categories: Divya Shishu Sanskar
Visit Author's Profile: Admin

बच्चों को संस्कारित करने के सरल तरीके

कुछ बच्चे घर से भाग जाते हैं । क्यों ? क्योंकि या तो बचपन में उन्हें खूब लाड़ लड़ाया गया है अथवा खूब रोका- टोका गया है ।

 

कुछ माता पिता अपने बच्चे को खूब लाड लड़ाते हैं । वे सोचते हैं कि बेटे को बढ़िया स्कूल में पढ़ायेंगे , पायलट , इंजीनियर आदि बनायेंगे ।इसके लिए बच्चे को छात्रावास में भी रखते हैं किन्तु बच्चा ऐसा हो जाता है कि न घर में रहता है , न छात्रावास में रहता है,   पायलट आदि बनता है वरन फुटपाथी हो जाता है । 

 

 बच्चों को विश्वास में लें

 

कुछ माँ-बाप बच्चों को खूब डाँटते हैं क्योंकि वे जैसा चाहते हैं बच्चे वैसा नहीं कर पाते । बच्चों की अपनी उमंगें हैं , अपनी खवाहिशे हैं, अपने अपने ढंग की योग्यता है; ज्यादा टोका टाकी से बच्चा बेचारा भीतर ही भीतर सिकुड़ता रहता है । फिर वह छुपकर गलती करता है और उसमें बेईमानी करने की आदत पनपती है ।


कभी माता-पिता की टोका-टाकी हितकारक होती है तो कभी गड़बड़ी कर देती है । माता-पिता या कुटुम्बी के लिए उचित है कि वे बच्चे को इतना विश्वास में लें कि बच्चा कोई गलती करे तो वह उन्हें बता दे । गलती जानकर उसको ज्यादा टोकें नहीं, गलती का मूल खोजें तथा उस मूल को हटा दें, बच्चा फिर गलती नहीं करेगा । 

 

खान-पान में ज्यादा लाड़ न लड़ाये स्वास्थ्य का ध्यान रखें

 

बालक पैदा होता है तब से लेकर ७ साल तक उसका मूलाधार केंद्र विकसित होता है । इन ७ सालों तक वह बीमार न हो इसकी सावधानी बरतें । ३ साल का होने पर साल में एक बार ३ ४ दिन पपीता और और उसके बीज खिलायें  ताकि उसका पेट ठीक रहे ।


बालक यदि इधर-उधर की चीज़ें खाता है, भोजन के समय ठीक ढंग से नहीं खाता तो आगे चलकर उसका पाचन- तंत्र खराब हो जायेगा । माता पिता को चाहिए कि बच्चों को खान पान में ज्यादा लाड न लड़ायें व खान-पान में ज्यादा लाड़ न लड़ायें व खान-पान की सलाह किसी  वैद्य या जानकार से लें ।

 

अच्छी भावनाओं का पोषण करें

 

७ से १४ वर्ष की उम्र में स्वाधिष्ठान केंद्र विकसित होता है । अगर इस उम्र में ध्यान न दिया गया तो बच्चे में गंदी भावनाएँ और गंदी आदतोंवाले बच्चों के संस्कार पड़ेंगे । इस समय वह जैसा देखेगा और जैसी भावनाएँ उसके चित्त में आ गयीं वे सब उसे जीवनभर नचाती रहेंगी । माता- पिता के लिए उचित है कि उसकी अच्छी भावनाओं का पोषण करें तथा बुरी भावनाओं को निकालने के लिए प्रोत्साहित करें लेकिन दबाव न डालें ।


 

-पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

 

Previous Article संत श्री आशारामजी बापू को माँ द्वारा बचपन में मिले प्रभुप्रीति के संस्कार
Next Article गर्भ से ही संस्कार की आवश्यकता क्यों ?
Print
127 Rate this article:
3.0

Please login or register to post comments.

Enter Title

  • Divya Shishu Sanskar App Link : Download 
  •  

      गुरुपूर्णिमा पर महिला उत्थान मंडल की विशेष प्रस्तुति ।

     

         दिव्य शिशु संस्कार Application (एप्लीकेशन) जल्द ही अब आपके एंड्राइड (Android) फोन पर ...

     

    जी हाँ, परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित

     

    * महिला उत्थान मंडल* द्वारा संचालित 

     

    * "दिव्य शिशु संस्कार अभियान" *  के अंतर्गत

     

    * गुरुपूर्णिमा महोत्सव पर  विमोचन हो रहा है "विशेष..... एंड्रॉइड ऐप्लीकेशन का...."

     

    * इस Application में आप जानेंगें - 

     

    तेजस्वी, स्वस्थ व संस्कारी संतान की प्राप्ति की शास्त्रोक्त युक्तियां ।

     

    क्या है दिव्य शिशु संस्कार ?

     

    शास्त्रों में बताये गए सोलह संस्कारों में से कौन सा है पहला संस्कार ?

     

    गर्भस्थ शिशु में संस्कारों की आवश्यकता क्यों ?

     

    कैसे करें उत्तम संतान की प्राप्ति ?

     

    माँ और शिशु के नाजुक बन्धन को जोड़ता गर्भ संवाद । 

     

    सामान्य प्रसूति के रामबाण उपाय ।

     

    कैसे करें नवजात शिशु का स्वागत ?

     

    गर्भवती व गर्भस्थ शिशु हेतु कारगर घरेलू नुस्ख़े ।

     

    यह  Application (एप्लीकेशन) शीघ्र ही प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगा ।

     

    महिला उत्थान मंडल, संत श्री आशारामजी बापू आश्रम, अहमदाबाद । 


    Contact Us:  09157306313