Shri Maa Mengiba ke Jivan Prasang

Shri Maa Mengiba ke Jivan Prasang

                        महान गुरुभक्त श्री माँ महँगीबा के जीवन प्रसंग


                                     अम्मा जी की दिव्य भावदशा 

एक बार अम्माजी वाटिका में टहल रही थीं | तभी एक साधक उनके दर्शन करने आया | उसे देख अम्मा ने प्रसन्नता से कहा : “ आज तो साईं (पूज्य बापूजी) कितनी मौज में हैं ! तूने दर्शन किये ?”

साधक : “ नहीं, अम्मा ! मुझे तो कई दिनों से दर्शन नहीं हुए |” 

अम्मा को दया आ गयी | एक सेवक को बुलाकर कहा : “बेचारे ने बहुत दिनों से दर्शन नहीं किये | इसे साथ ले जा, साईंजी कुटिया में बैठे हैं, तू इसे दर्शन करवा दे |”

वह बेचारा साधक क्या बोलता ! वह तो जानता था कि पूज्य बापूजी अभी दिल्ली में हैं पर अम्माजी को दर्शन की तीव्र तड़प के कारण नित्य प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं | 

साधक : अम्मा ! मैं अभी बाहर जा रहा हूँ, फिर आकर दर्शन कर लूँगा |” 

अम्मा दिन भर राह देखती रहीं कि वह आये तो उसे साईं के दर्शन करवा दूँ | वे सेविका से कहने लगीं : “बेचारे को बिना दर्शन के ही जाना पड़ा | अब न जाने कितने बजे उसका आना होगा !” 

सेविका ने अम्मा की चिंता दूर करने के लिए अम्मा की फ़ोन द्वारा उस भाई से बात करवा दी | 
अम्मा ने पूछा : “दर्शन किये ?”

अम्मा जी की ऐसी ऊँची भावदशा एवं साधकों के प्रति अत्याधिक करुणा देख उसकी आँखों में आँसू उभर आये | 

स्नेहकम्पित वाणी में वह बोला : “हाँ अम्मा ! दर्शन हो गये | आपकी करुणा के, गुरुभक्ति के और दिव्य भावदशा के भी !” 

उसका हृदय गदगद और रोम-रोम पुलकित हो रहा था | ऐसी वात्सल्यमूर्ति और महान गुरुभक्त माँ की कोख से ही कारुण्यमूर्ति, ज्ञानावतार पूज्य बापूजी का प्राकटय हुआ | 


                                 अम्माजी की भगवन्नाम-निष्ठा का प्रभाव 

एक बार की बात है | आश्रम की गौशाला में सेवा करनेवाला एक साधक भाई अम्माजी के दर्शन करने आया | अम्माजी उसको सिंधी भाषा में कुछ समझाने लगीं | वह सिंधी नहीं जानता था | अम्माजी की वाणी को बीच में रोककर यह बात बताने में उसे संकोच हो रहा था परन्तु अम्माजी की सेविका भाँप गयी | उसने कहा : “अम्माजी  ! इसे सिंधी नहीं आती है |” 

अम्मा ने पूछा : “ क्या तू सचमुच समझ नहीं पाया ?” 

उसने कहा : “ हाँ अम्मा ! मुझे कुछ समझ में नहीं आया |” 

बच्चे की निर्दोषता, सहजता पर अम्माजी मुस्कुराने लगीं | फिर अम्माजी ने ॐ...ॐ... ॐ... का उच्चारण करते हुए दोनों हाथ ऊपर करके हास्य-प्रयोग किया और उससे भी करवाया |

फिर बोली : “यह तो समझ में आया न ?”  

आश्रमवासी : “जी अम्मा !”

उस भाई का मुखमंडल प्रसन्नता से खिल उठा | अम्माजी ने वात्सल्यभरी दृष्टि डालते हुए कहा : “बस ! यही एक सार है | इसे ही समझना है |” 

अम्माजी का संकल्प कहो या उनका आशीर्वाद, उनकी भगवन्नाम-निष्ठा की ऊँचाई, उस दिन से उस साधक को ॐकार की साधना में एक विलक्षण आनंद आने लगा | 

                     समर्थ संत की समर्थ माता के श्रीचरणों में बारम्बार प्रणाम ! 

 

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