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माँ ! तू कितनी महान...

माँ ! तू कितनी महान...

      महिलाओं के लिए विशेष

 

मानव की शिक्षा जन्म से ही नहीं बल्कि गर्भावस्था से ही शुरू होती है और यह भी प्रमाणित एवं अनुभूत सत्य है कि जीवन के उत्तरकाल की अपेक्षा पूर्वकाल में मानव के चित्त पर पड़े संस्कार अधिकाधिक प्रभाव दिखाते हैं एवं जीवन में दीर्घकाल तक देखे जाते हैं । उसमें भी गर्भावस्था एवं बाल्यकाल में १४ साल तक दिए गए संस्कार तो सर्वाधिक प्रभावशाली होते हैं एवं व्यक्ति पर जीवनभर अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं । ये उसके लिए जीवनभर की एक पूंजी बन जाते हैं । भारत के ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में यह तथ्य हजारों-लाखों वर्ष पहले ही लिख रखा है । हमारा गौरवशाली इतिहास विष्णु-पुराणमें वर्णित प्रहलाद, महाभारत में वर्णित अभिमन्यु आदि अनेकानेक चरित्रों से इसे सुस्पष्ट करता है । आज का विज्ञान भी अब इसे स्वीकार कर रहा है ।


बच्चों के विकास में सुसंस्कार महती भूमिका निभाते हैं । माँ मात्र बालक की ही नहीं बल्कि उसके संस्कारों की भी जन्मदात्री है । बाल्यावस्था में बच्चों को जैसे संस्कार दिये जाते हैं, आगे चलकर वे वैसे ही बनते हैं । महापुरुषों की महानता में प्राय: उनकी माताओं का भी अमूल्य योगदान पाया जाता है । इसीलिए बचपन से ही निर्भयता, साहस, भगवदभक्ति, आत्मबल के संस्कार दिये जायें तो ये संस्कार बच्चों को अवश्य महानता की ऊँचाइयों तक पहुँचा देंगें ।


बालक को सुसंस्कारी बनाने में माता-पिता की महत्ववपूर्ण भूमिका होती है । वे मानो एक प्रकार के माली हैं । इन दोनों में से भी माता का प्रभाव अधिक होता है क्योंकि गर्भ से ही संतान पर माता के खान-पान, आचार विचार आदि का प्रभाव पड़ता है । माँ संतान में बचपन से ही सुसंस्कारों की नींव डाल सकती है । इस पुस्तक में ऐसे एक-दो नहीं, कई उदाहरण हैं जिनसे मातृशक्ति की महिमा का परिचय मिलता है ।


वर्तमान समय में पाश्चात्य कल्चर के दुष्प्रभाव से हमारी संस्कृति की संस्कार-सरिता पर कुछ काई-सी छायी नजर आ रही है, ऐसे में माताओं- बहनों के लिए पूर्व की महान माताओं की शिक्षाएं एवं आचरण आदर्शरूप सिद्ध होंगें । महान माताओं द्वारा अपनी संतानों में किये गये सुसंस्कार-सिंचन के प्रसंगों तथा महापुरुषों की शिक्षाओं, उनके बचपन के प्रेरणादायी जीवन-प्रसंगों आदि से ओत-प्रोत यह पुस्तक आपके करकमलों में देते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता हो रही है । महिलाएँ इस पुस्तक का लाभ लें तथा महिला उत्थान मंडल द्वारा चलाये जा रहे दिव्य शिशु संस्कार वर्गों का भी लाभ लें तो सोने में सुहागा जैसा लाभ होगा ।

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