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मुद्राएँ

      प्रातः स्नान आदि के बाद आसन बिछा कर हो सके तो पद्मासन में अथवा सुखासन में बैठें। पाँच-दस गहरे साँस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। उसके बाद शांतचित्त होकर निम्न मुद्राओं को दोनों हाथों से करें। विशेष परिस्थिति में इन्हें कभी भी कर सकते हैं।

मुद्राएँ

सूर्यमुद्रा
सूर्यमुद्रा

      अनामिका अर्थात सबसे छोटी उँगली केपास वाली उँगली को मोड़कर उसके नख के ऊपरवाले भाग को अँगूठे से स्पर्श करायें। शेष तीनोंउँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः शरीर में एकत्रित अनावश्यक चर्बी एवं स्थूलताको दूर करने के लिए यह एक उत्तम मुद्रा है।

शून्य मुद्रा
शून्य मुद्रा

    सबसे लम्बी उँगली (मध्यमा) कोअंदर की ओर मोड़कर उसके नख के ऊपर वालेभाग पर अँगूठे का गद्दीवाला भाग स्पर्श करायें। शेषतीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः कान का दर्द मिट जाता है। कान में से पसनिकलता हो अथवा बहरापन हो तो यह मुद्रा 4 से 5 मिनट तक करनी चाहिए।

वायु मुद्रा
वायु मुद्रा

तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को मोड़करऊपर से उसके प्रथम पोर पर अँगूठे की गद्दीस्पर्श कराओ। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द, लकवा, पक्षाघात,हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभ होता है। इस मुद्राके साथ प्राण मुद्रा करने से शीघ्र लाभ मिलता है।

लिंग मुद्रा
लिंग मुद्रा

दोनों हाथों की उँगलियाँ परस्परभींचकर अन्दर की ओर रहते हुए अँगूठे कोऊपर की ओर सीधा खड़ा करें।
लाभः शरीर में ऊष्णता बढ़ती है, खाँसी मिटतीहै और कफ का नाश करती है।

प्राण मुद्रा
प्राण मुद्रा

कनिष्ठिका, अनामिका और अँगूठे के ऊपरी भागको परस्पर एक साथ स्पर्श करायें। शेष दो उँगलियाँसीधी रहें।
लाभः यह मुद्रा प्राण शक्ति का केंद्र है। इससे शरीरनिरोगी रहता है। आँखों के रोग मिटाने के लिए व चश्मेका नंबर घटाने के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है।

 

पृथ्वी मुद्रा
पृथ्वी मुद्रा

कनिष्ठिका यानि सबसे छोटी उँगली कोअँगूठे के नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनोंउँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः शारीरिक दुर्बलता दूर करने के लिए, ताजगीव स्फूर्ति के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है।इससे तेज बढ़ता है।

ज्ञान मुद्रा
ज्ञान मुद्रा

अँगूठे के पास वाली पहली उँगलीको अँगूठे के मूल में लगाकर अँगूठे के अग्रभाग कीबीच की दोनों उँगलियों के अग्रभाग के साथ मिलाकरसबसे छोटी उँगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधीरखें। इस स्थिति को अपानवायु मुद्रा कहते हैं। अगरकिसी को हृदयघात आये या हृदय में अचानकपीड़ा होने लगे तब तुरन्त ही यह मुद्रा करने से
हृदयघात को भी रोका जा सकता है।

लाभः हृदयरोगों जैसे कि हृदय की घबराहट,हृदय की तीव्र या मंद गति, हृदय का धीरे-धीरेबैठ जाना आदि में थोड़े समय में लाभ होता है।पेट की गैस, मेद की वृद्धि एवं हृदय तथा पूरेशरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है।आवश्यकतानुसारहर रोज़ 20 से 30 मिनट तक इस मुद्राका अभ्यास किया जा सकता है।

वरुण मुद्रा

मध्यमा अर्थात सबसे बड़ी उँगली के मोड़ करउसके नुकीले भाग को अँगूठे के नुकीले भाग पर स्पर्श करायें।शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः यह मुद्रा करने से जल तत्त्व की कमी के कारण होनेवाले रोग जैसे कि रक्तविकार और उसके फलस्वरूप होनेवाले चर्मरोग व पाण्डुरोग (एनीमिया) आदि दूर होते है।

अपानवायु मुद्रा
अपानवायु मुद्रा

अँगूठे के पास वाली पहली उँगलीको अँगूठे के मूल में लगाकर अँगूठे के अग्रभाग कीबीच की दोनों उँगलियों के अग्रभाग के साथ मिलाकरसबसे छोटी उँगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधीरखें। इस स्थिति को अपानवायु मुद्रा कहते हैं। अगरकिसी को हृदयघात आये या हृदय में अचानकपीड़ा होने लगे तब तुरन्त ही यह मुद्रा करने से
हृदयघात को भी रोका जा सकता है।

लाभः हृदयरोगों जैसे कि हृदय की घबराहट,हृदय की तीव्र या मंद गति, हृदय का धीरे-धीरेबैठ जाना आदि में थोड़े समय में लाभ होता है।पेट की गैस, मेद की वृद्धि एवं हृदय तथा पूरेशरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है।आवश्यकतानुसारहर रोज़ 20 से 30 मिनट तक इस मुद्राका अभ्यास किया जा सकता है।

ब्रह्ममुद्रा
ब्रह्ममुद्रा

ब्रह्ममुद्रा योग की लुप्त हुई क्रियाओं में से एक महत्त्वपूर्ण मुद्रा है । ब्रह्मा के तीन मुख और दत्तात्रेय के स्वरूप को स्मरण करते हुए व्यक्ति तीन दिशा में सिर घुमाये ऐसी यह क्रिया है अतः इस क्रिया को ब्रह्ममुद्रा कहते हैं ।
विधिः वज्रासन या पद्मासन में कमर सीधी रखते हुए बैठें । हाथों को घुटनों पर रखें । कन्धों को ढीला रखें । अब गर्दन को सिर के साथ ऊपर नीचे दस बार धीरे-धीरे करें । सिर को अधिक पीछे जाने देवें । गर्दन ऊपर नीचे चलाते वक्त आँखें खुली रखें । श्वास चलने देवें । गर्दन को ऊपर नीचे करते वक्त झटका न देवें । फिर गर्दन को धीरे-धीरे दाँये-बाँये 10 बार चलाना चाहिए । गर्दन को चलाते वक्त ठौड़ी और कन्धा एक ही दिशा में लाने तक गर्दन तक घुमायें । इस प्रकार गर्दन को 10 बार दाँये-बाँये चलायें और अन्त में गर्दन को गोल घुमाना है । गर्दन को ढीला छोड़कर एक तरफ से धीरे-धीरे गोल घुमाते हुए 10 चक्कर लगायें । आँखें खुली रखें । फिर दूसरी तरफ से गोल घुमायें । गर्दन से धीरे-धीरे चक्कर लगायें । हो सके तो कान को कन्धों से लगायें । इस प्रकार ब्रह्ममुद्रा का अभ्यास करें ।
लाभः सिरदर्द, सर्दी-जुकाम आदि में लाभ होता है । ध्यान-साधना-सत्संग के समय नींद नहीं आयेगी । आँखों की कमजोरी दूर होती है । चक्कर बँद होते हैं । उल्टी, चक्कर, अनिद्रा और अतिनिद्रा आदि पर ब्रह्ममुद्रा का अचल प्रभाव पड़ता है । जिन लोगों को नींद में अधिक सपने आते हैं वे इस मुद्रा का अभ्यास करें तो सपने कम जाते हैं । ध्वनि-संवेदनशीलता कम होती है । मानसिक अवसाद (DEPRESSION) कम होता है । एकाग्रता बढ़ती है । गर्दन सीधी रखने में सहायता मिलती है ।