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प्राणायाम

      प्राणायाम शब्द का अर्थ हैः प्राण+आयाम ।

      प्राण अर्थात् जीवनशक्ति और आयाम अर्थात नियमन । श्वासोच्छ्वास की प्रक्रिया का नियमन करने का कार्य़ प्राणायाम करता है ।

प्राणायाम-परिचय

      जिस प्रकार एलौपैथी में बीमारियों का कारण जीवाणु, प्राकृतिक चिकित्सा में विजातीय तत्त्व एवं आयुर्वेद में आम रस (आहार न पचने पर नस-नाड़ियों में जमा कच्चा रस) माना गया है उसी प्रकार प्राण चिकित्सा में रोगों का कारण निर्बल प्राण माना गया है । प्राण के निर्बल हो जाने से शरीर के अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाने के कारण ठीक से कार्य नहीं कर पाते । शरीर में रक्त का संचार प्राणों के द्वारा ही होता है । अतः प्राण निर्बल होने से रक्त संचार मंद पड़ जाता है । पर्याप्त रक्त न मिलने पर कोशिकाएँ क्रमशः कमजोर और मृत हो जाती हैं तथा रक्त ठीक तरह से हृदय में न पहुँचने के कारण उसमें विजातीय द्रव्य अधिक हो जाते हैं । इन सबके परिणामस्वरूप विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं ।

      सूर्य नियमितता, तेज एवं प्रकाश के प्रतीक हैं। उनकी किरणें समस्त विश्व में जीवन का संचार करती हैं। भगवान सूर्यनारायण सतत् प्रकाशित रहते हैं। वे अपने कर्त्तव्य पालन में एक क्षण के लिए भी प्रमाद नहीं करते, कभी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होते। प्रत्येक मनुष्य में भी इन सदगुणों का विकास होना चाहिए। नियमितता, लगन, परिश्रम एवं दृढ़ निश्चय द्वारा ही मनुष्य जीवन में सफल हो सकता है तथा कठिन परिस्थितियों के बीच भी अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है।जितने भी सामाजिक एवं नैतिक अपराध हैं, वे विशेषरूप से सूर्यास्त के पश्चात् अर्थात् रात्रि में ही होते हैं। सूर्य की उपस्थिति मात्र ही इन दुष्प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर देती है। सूर्य के उदय होने से समस्त विश्व में मानव, पशु-पक्षी आदि क्रियाशील होते हैं। यदि सूर्य को विश्व-समुदाय का प्रत्यक्ष देव अथवा विश्व-परिवार का मुखिया कहें तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।

      यह व्यवहारिक जगत में देखा जाता है कि उच्च प्राणबलवाले व्यक्ति को रोग उतना परेशान नहीं करते जितना कमजोर प्राणबलवाले को । प्राणायाम के द्वारा भारत के योगी हजारों वर्षों तक निरोगी जीवन जीते थे, यह बात तो सनातन धर्म के अनेक ग्रन्थों में है । योग चिकित्सा में दवाओं को बाहरी उपचार माना गया है जबकि प्राणायाम को आन्तरिक उपचार एवं मूल औषधि बताया गया है । जाबाल्योपनिषद् में प्राणायाम को समस्त रोगों का नाशकर्ता बताया गया है ।

      शरीर के किसी भाग में प्राण ज़्यादा होता है तो किसी भाग में कम । जहाँ ज़्यादा है वहाँ से प्राणों को हटाकर जहाँ उसका अभाव या कमी है वहाँ प्राण भर देने से शरीर के रोग दूर हो जाते हैं । सुषुप्त शक्तियों को जगाकर जीवनशक्ति के विकास में प्राणायाम का बड़ा मह्त्त्व है ।

      भोजन करने से आधा घंटा पूर्व व भोजन करने के चार घंटे बाद प्राणायाम किये जा सकते हैं ।

प्राणायाम के लाभ

  1. प्राणायाम में गहरे श्वास लेने से फेफड़ों के बंद छिद्र खुल जाते हैं तथा रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है । इससे रक्त, नाड़ियों एवं मन भी शुद्ध होता है ।
  2. त्रिकाल संध्या के समय सतत चालीस दिन तक 10-10 प्राणायाम करने से प्रसन्नता, आरोग्यता बढ़ती है एवं स्मरणशक्ति का भी विकास होता है ।
  3. प्राणायाम करने से पाप कटते हैं । जैसे मेहनत करने से कंगाली नहीं रहती है, ऐसे ही प्राणायाम करने से पाप नहीं रहते हैं ।

      प्राणायाम में श्वास को लेने का, अंदर रोकने का, छोड़ने का और बाहर रोकने के समय का प्रमाण क्रमशः इस प्रकार हैः 1-4-2-2 अर्थात् यदि 5 सेकेण्ड श्वास लेने में लगायें तो 20 सेकेण्ड रोकें और 10 सेकेण्ड उसे छोड़ने में लगाएं तथा 10 सेकेण्ड बाहर रोकें यह आदर्श अनुपात है । धीरे-धीरे नियमित अभ्यास द्वारा इस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है ।

प्राणायाम विधि

अनुलोम-विलोम प्राणायामः
अनुलोम-विलोम प्राणायामः

प्राणायाम के कुछ प्रमुख अंग

1.      रेचकः अर्थात् श्वास को बाहर छोड़ना ।
2.      
पूरकः अर्थात् श्वास को भीतर लेना ।
3.      
कुंभकः अर्थात् श्वास को रोकना । श्वास को भीतर रोकने की क्रिया को आंतर कुंभक तथा बाहर रोकने की क्रिया को बहिर्कुंभक कहते हैं ।
 


     अनुलोम-विलोम प्राणायामः

                इस प्राणायाम में सर्वप्रथम दोनों नथुनों से पूरा श्वास बाहर निकाल दें । इसके बाद दाहिने हाथ के अँगूठे से नाक के दाहिने नथुने को बन्द करके बाँए नथुने से सुखपूर्वक दीर्घ श्वास लें । अब यथाशक्ति श्वास को रोके रखें । फिर बाँए नथुने को मध्यमा अँगुली से बन्द करके श्वास को दाहिने नथुने से धीरे-धीरे छोड़ें । इस प्रकार श्वास के पूरा बाहर निकाल दें और फिर दोनों नथुनों को बन्द करके श्वास को बाहर ही सुखपूर्वक कुछ देर तक रोके रखें । अब पुनः दाहिने नथुने से श्वास लें और फिर थोड़े समय तक रोककर बाँए नथुने से श्वास धीरे-धीरे छोड़ें । पूरा श्वास बाहर निकल जाने के बाद कुछ समय तक रोके रखें । यह एक प्राणायाम हुआ ।

प्राणायाम में पूरक, आभ्यंतर कुंभक, रेचक व बाह्य कुंभक के समय का अनुपात इस प्रकार हैः 1:4:2:2 अर्थात् श्वास लेने में यदि 10 सेकंड लगायें तो 40 सेकंड अंदर रोककर रखें। 20 सेकंड श्वास छोड़ने में लगायें तथा 20 सेकंड बाहर रोकें। यह आदर्श अनुपात है। धीरे धीरे अभ्यास द्वारा इस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

20 सेकंड पूरक, 80 सेकंड आभ्यंतर कुंभक, 40 सेकंड रेचक व 40 सेकंड बाह्य कुंभक यह उत्तम प्राणायाम है। कुंभक की अवस्था में मानसिक जप अत्यन्त लाभदायी है। इस प्रकार जप सहित प्राणायाम को 'सबीज प्राणायाम' कहा जाता है। ऐसे 5 प्राणायाम से शुरूआत करके 6...,7.... इस प्रकार बढ़ाते हुए कम से कम 10 प्राणायाम तो नियमित करें।

लाभः इससे श्वास लयबद्ध तथा सूक्ष्म हो जाते हैं,साधक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिकता में भी शीघ्रता से अग्रसर होता है।

मानसिक तनाव दूर होता है। नकारात्मक विचार परिवर्तित होकर सकारात्मक होने लगते हैं। आनंद, उत्साह व निर्भयता की प्राप्ति होती है।

 

केवलीकुम्भक

केवलया केवली कुम्भक का अर्थ है रेचक-पूरक बिना ही प्राण का स्थिर हो जाना । जिसको केवली कुम्भक सिद्ध होता है उस योगी के लिए तीनों लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता । कुण्डलिनी जागृत होती है, शरीर पतला हो जाता है, मुखप्रसन्न रहता है, नेत्र मल रहित होते हैं । सर्व रोग दूर हो जाते हैं। बिन्दु पर विजय होती है। जठराग्नि प्रज्वलित होती है ।
केवली कुम्भक सिद्ध किये हुए योगी की अपनी सर्वमनोकामनायें पूर्ण होती हैं । इतना ही नहीं, उसका पूजन करके श्रद्धावान लोग भी अपनी मनोकामनायें पूर्ण करने लगते हैं ।
जो साधक पूर्ण एकाग्रता से त्रिबन्ध सहित प्राणायाम के अभ्यास द्वारा केवली कुम्भक का पुरूषार्थ सिद्ध करता है उसके भाग्य का तो पूछना ही क्या ? उसकी व्यापकता बढ़ जाती है । अन्तर में महानता का अनुभव होता है । काम, क्रोध, लोभ,  मोह,  मद और मत्सर इन छः शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है । केवली कुम्भक की महिमा अपार है ।

 

गजकरणी

विधिः करीब दोलिटर पानीगुनगुना सागरम करें ।उसमें करीब 20 ग्राम शुद्ध नमकघोल दें ।सैन्धव मिलजाये तो अच्छाहै । अब पंजोंके बल बैठकरवह पानी गिलासभर-भर के पीतेजायें । खूबपियें ।अधिकाअधिकपियें । पेट जबबिल्कुल भरजाये, गले तकआ जाये, पानीबाहर निकालनेकी कोशिश करेंतब दाहिने हाथकी दो बड़ीअंगुलियाँमुँह में डालकर उल्टी करें, पिया हुआ सबपानी बाहरनिकाल दें ।पेट बिल्कुलहल्का हो जायेतब पाँच मिनटतक आराम करें ।
गजकरणीकरने के एकाधघण्टे के बादकेवल पतली खिचड़ीही भोजन मेंलें । भोजन केबाद तीन घण्टेतक पानी नपियें, सोयेंनहीं, ठण्डेपानी से स्नानकरें । तीनघण्टे के बादप्रारम्भ मेंथोड़ा गरमपानी पियें ।

लाभः गजकरणीसे एसिडीटी केरोगी को अदभुतलाभ होता है ।ऐसे रोगी कोचार-पाँच दिनमें एक बारगजकरणीचाहिए ।तत्पश्चातमहीने में एकबार, दोमहीने में एकबार, छःमहीने में एकबार भी गजकरणीकर सकते हैं ।
प्रातः कालखाली पेटतुलसी के पाँच-सातपत्ते चबाकरऊपर से थोड़ाजल पियें । एसीडीटीके रोगी कोइससे बहुत लाभहोगा ।
वर्षोंपुराने कब्जके रोगियों कोसप्ताह में एकबार गजकरणी कीक्रिया अवश्यकरनी चाहिए । उनकाआमाशयग्रन्थिसंस्थानकमजोर हो जानेसे भोजन हजमहोने मेंगड़बड़ रहतीहै । गजकरणी करनेसे इसमें लाभहोता है ।फोड़े,फुन्सी, सिरमें गर्मी, सर्दी,बुखार, खाँसी,दमा, टी.बी.,वात-पित्त-कफके दोष, जिह्वाके रोग, गलेके रोग, छातीके रोग, छातीका दर्द एवंमंदाग्नि मेंगजकरणी क्रियालाभकारक है ।

 

जलनेति
जलनेति

विधिः एक लिटरपानी कोगुनगुना सागरम करें । उसमेंकरीब दस ग्रामशुद्ध नमकडालकर घोलदें । सैन्धवमिल जाये तोअच्छा । सुबहमें स्नान के बादयह पानी चौड़ेमुँहवालेपात्र में,कटोरे मेंलेकर पैरों परबैठ जायें ।पात्र कोदोनों हाथोंसे पकड़ करनाक के नथुनेपानी में डुबोदें । अबधीरे-धीरे नाकके द्वाराश्वास के साथपानी को भीतरखींचें और नाकसे भीतर आतेहुए पानी कोमुँह से बाहरनिकालतेजायें । नाक कोपानी में इसप्रकार बराबरडुबोये रखें जिससेनाक द्वाराभीतरजानेवालेपानी के साथ हवान प्रवेश करे ।अन्यथाआँतरस-खाँसीआयेगी ।
इसप्रकार पात्रका सब पानीनाक द्वारालेकर मुखद्वारा बाहरनिकाल दें । अबपात्र को रखकर खड़े होजायें । दोनोंपैर थोड़ेखुले रहें ।दोनों हाथ कमरपर रखकर श्वासको जोर से बाहरनिकालते हुएआगे की ओरजितना हो सकेझुकें ।भस्रिका केसाथ यह क्रियाबार-बार करें,इससे नाक केभीतर का सबपानी बाहरनिकल जायेगा ।थोड़ा बहुत रहभी जाये औरदिन में कभी भीनाक से बाहरनिकल जाये तोकुछचिन्ताजनक नहींहै ।
नाकसे पानी भीतरखींचने की यहक्रियाप्रारम्भ मेंउलझन जैसीलगेगी लेकिनअभ्यास होजाने परबिल्कुल सरलबन जायेगा ।

लाभः मस्तिष्ककी ओर से एकप्रकार काविषैला रस नीचेकी ओर बहताहै । यह रस कानमें आये तोकान के रोगहोते हैं,आदमी बहराहो जाता है ।यह रस आँखोंकी तरफ जायेतो आँखों कातेज कम होजाता है,चश्मे कीजरूरत पड़तीहै तथा अन्यरोग होते हैं ।यह रस गले कीओर जाये तोगले के रोगहोते हैं ।
नियमपूर्वकजलनेति करनेसे यह विषैलापदार्थ बाहरनिकल जाता है ।आँखों की रोशनीबढ़ती है ।चश्मे कीजरूरत नहींपड़ती । चश्माहो भी तोधीरे-धीरेनम्बर कमहोते-होते छूटजाता भी जाताहै ।श्वासोच्छोवासका मार्ग साफहो जाता है ।मस्तिष्क मेंताजगी रहती है ।जुकाम-सर्दीहोने के अवसरकम हो जाते हैं ।जलनेति कीक्रिया करनेसे दमा,टी.बी., खाँसी,नकसीर, बहरापनआदि छोटी-मोटी 1500 बीमीरियाँदूर होती हैं ।जलनेति करनेवाले को बहुतलाभ होते हैं ।चित्त मेंप्रसन्नताबनी रहती है ।

 

त्रिबन्ध

ध्यान दें- विशेष ध्यान देने की बात है कि मूलबंध (गुदा का संकोचन करना), उड्डीयानबंध (पेट को अंदर की ओर सिकोड़कर ऊपर की ओर खींचना) एवं जालंधरबंध (ठोढ़ी को कंठकूप से लगाना) – इस तरह से त्रिबंध करके यह प्राणायाम करने से अधिक लाभदायक सिद्ध होता है ।
प्रातःकाल ऐसे 5 से 10 प्राणायाम करने का प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए ।

मूलबन्ध
शौचस्नानादि सेनिवृत्त होकरआसन पर बैठजायें । बायींएड़ी केद्वारा सीवनया योनि कोदबायें ।दाहिनी एड़ीसीवन पर रखें ।गुदाद्वार कोसिकोड़करभीतर की ओरऊपर खींचें ।यह मूलबन्धकहा जाता है ।
लाभः मूलबन्ध केअभ्यास सेमृत्यु को जीतसकते हैं ।शरीर में नयीताजगी आती है ।बिगड़ते हुएस्वास्थ्य कीरक्षा होतीहै ।ब्रह्मचर्यका पालन करनेमें मूलबन्धसहायक सिद्धहोता है । वीर्यको पुष्ट करताहै, कब्जको नष्ट करताहै,जठराग्नि तेजहोती है ।मूलबन्ध सेचिरयौवनप्राप्त होताहै । बाल सफेदहोने से रुकतेहैं ।
अपानवायऊर्ध्वगतिपाकरप्राणवायु केसुषुम्ना मेंप्रविष्टहोता है ।सहस्रारचक्रमेंचित्तवृत्तिस्थिर बनतीहै । इससेशिवपद का आनन्दमिलता है ।सर्व प्रकारकी दिव्यविभूतियाँ औरऐश्वर्यप्राप्त होतेहैं । अनाहतनाद सुनने कोमिलता है ।प्राण, अपान,नाद औरबिनदुएकत्रित होनेसे योग मेंपूर्णताप्राप्त होतीहै ।

उड्डीयानबन्ध
आसनपर बैठकर पूराश्वास बाहरनिकाल दें ।सम्पर्णतयारेचक करें ।पेट को भीतरसिकोड़कर ऊपरकी ओर खींचें ।नाभि तथाआँतें पीठ कीतरफ दबायें ।शरीर को थोड़ासा आगे की तरफझुकायें । यहहै उड्डीयानबन्ध ।
लाभः इसके अभ्यास सेचिरयौवनप्राप्त होताहै । मृत्यु परजय प्राप्तहोती है ।ब्रह्मचर्यके पालन मेंखूब सहायतामिलती है ।स्वास्थ्यसुन्दर बनताहै ।कार्यशक्तिमें वृद्धिहोती है ।न्योलि औरउड्डीयानबन्धजब एक साथकिये जाते हैंतब कब्ज दुमदबाकर भाग खड़ाहोता है । पेटके तमामअवयवों कीमालिश हो जातीहै । पेट कीअनावश्यक  चरबीउतर जाती है ।
जालन्धरबन्ध
आसनपर बैठकर पूरककरके कुम्भककरें और ठोड़ीको छाती केसाथ दबायें ।इसकोजालन्धरबन्धकहते हैं ।
लाभः जालन्धरबन्धके अभ्यास सेप्राण कासंचरण ठीक सेहोता है । इड़ाऔर पिंगलानाड़ी बन्दहोकरप्राण-अपानसुषुम्ना मेंप्रविष्टहोते हैं ।नाभि से अमृतप्रकट होता हैजिसका पानजठराग्निकरता है । योगीइसके द्वाराअमरताप्राप्त करताहै ।
पद्मासनपर बैठ जायें ।पूरा श्वासबाहर निकाल करमूलबन्ध,उड्डीयानबन्धकरें । फिर खूबपूरक करकेमूलबन्ध,उड्डीयानबन्धऔरजालन्धरबन्धये तीनों बन्धएक साथ करें ।आँखें बन्दरखें । मन मेंप्रणव(ॐ) काअर्थ के साथजप करें ।
इसप्रकारप्राणायामसहित तीनोंबन्ध का एक साथअभ्यास करनेसे बहुत लाभहोता है औरप्रायःचमत्कारिकपरिणाम आताहै । केवल तीनही दिन केसम्यक अभ्याससे जीवन मेंक्रान्ति काअनुभव होनेलगता है । कुछसमय के अभ्याससे केवल या केवलीकुम्भक स्वयंप्रकट होताहै ।

भ्रामरी प्राणायाम
भ्रामरी प्राणायाम

स्मरणशक्ति और बौद्धिक शक्ति बढ़ाने हेतु नित्य भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास चाहिए  ।
परिचयः  स्मरणशक्ति तथा बौद्धिक शक्तियों को विकसित करने के लिए यह सर्वसुलभ व बहु-उपयोगी प्राणायाम है । इस प्राणायाम में भ्रमर अर्थात् भँवरे की तरह गुंजन करना होता है इसीलिए इसका नाम भ्रामरी प्राणायाम रखा गया है ।
लाभः समृतिशक्ति का विकास होता है, ज्ञानतंतुओं को पोषण मिलता है, मस्तिष्क की नाड़ियों का शोधन होता है । 
विधिः पद्मासन में सीधे बैठ जायें । खूब गहरा श्वास लेकर दोनों हाथों की तर्जनी (अँगूठे के पासवाली) उँगली से अपने दोनों कानों के छिद्र बंद कर लें । कुछ समय श्वास रोके रखें । श्वास छोड़ते हुए होंठ बंद रखकरभौंरे (भ्रमर) की तरह ‘ॐ’ का दीर्घ गुंजन करें ।
ध्यान दें- आँखें और होंठ बंद रहें । ऊपर व नीचे के दाँतोंके बीच आधे से एक सेंटीमीटर का फासला रहे ।
विशेषः इसके नियमित अभ्यास द्वारा यादशक्ति व बुद्धिशक्ति का विकास किया जा सकता है । यह प्राणायाम प्रतिदिन पाँच से दस बार करें ।
 

ऊर्जायी प्राणायाम

इसको करने से हमें विशेष ऊर्जा (शक्ति) मिलती है, इसलिए इसे ऊर्जायीप्राणायाम कहते हैं ।
विधि- पद्मासन या सुखासन में बैठ कर गुदा का संकोचन करके मूलबंध लगाएं । फिर नथुनों, कंठ और छाती पर श्वास लेने का प्रभाव पड़े उस रीति से जल्दी श्वास लें । अब नथुनों को खुला रखकर संभव हो सके उतने गहरे श्वास लेकर नाभि तक के प्रदेश को श्वास से भर दें । इसके बाद एकाध मिनट कुंभक करके बाँयें नथुने से श्वास धीरे-धीरे छोड़ें । ऐसे दस ऊर्जायी प्राणायाम करें । इससे पेट का शूल, वीर्यविकार, स्वप्नदोष, प्रदर रोग जैसे धातु संबंधी रोग मिटते हैं ।

संस्कृति रक्षक प्राणायाम

गहरा श्वास लेकरर ॐकार का जप करें, आखिर में ‘म’ को घंटनाद की नाईं गूँजने दें। ऐसे 11 प्राणायाम फेफड़ों की शक्ति बढ़ायेंगे, रोगप्रतिकारक शक्ति तो बढ़ायेंगे साथ ही वातावरण में भी भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल होने की शक्ति अर्जित करने का आपके द्वारा महायज्ञ होगा।
हो सके तो सुबह 4 से 5 बजे के बीच करें। यह स्वास्थ्य के लिए और सभी प्रकार से बलप्रद होगा। यदि इस समय न कर पायें तो किसी भी समय करें पर करें अवश्य। कम से कम 11 प्राणायाम करें, ज्यादा कितने भी कर सकते हैं।
अधिकस्य अधिकं फलम्।
विधिः
सुबह उठकर थोड़ी देर शांत हो जाओ, भगवान के ध्यान में बैठें । ॐ शांति…. ॐ आनन्द…. करते करते आनंद और शांति में शांत हो जायें। सुबह की शांति प्रसाद की जननी है, सदबुद्धि की जननी है। फिर स्नान आदि करके खूब श्वास भरो, त्रिबन्ध करो-पेट को अंदर खींचो, गुदाद्वार को अंदर सिकोड़ लें,ठुड्डी को छाती से लगा लें । मन में संस्कृति-रक्षा का संकल्प दोहराकर भगवान का नाम जपते हुए सवा से डेढ़ मिनट श्वास रोके रखें । फिर श्वास छोड़ें । श्वास लेते और छोड़ते समय ॐकार का मानसिक जप करते रहें। फिर 50 सैकेंड से सवा मिनट तक श्वास बाहर रोक सकते हैं। मन में ॐकार या भगवन्नाम का जप चालू रखें । शरीर में जो भी आम (कच्चा, अपचित रस) होगा, वायुदोष होगा, वह खिंच के जठर में स्वाहा हो जायेगा। वर्तमान की अथवा आने वाली बीमारियों कककी जड़े स्वाहा होती जायेंगी। आपकी सुबह मंगलमय होगी और आपके द्वारा मंगलकारी परमात्मा मंगलमय कार्य करवायेगा। आपका शरीर और मन निरोग तथा  बलवान बन के रहेगा।

 

ब्रह्मचर्य- रक्षा व १४० प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा का उपाय : स्थलबस्ती

सुबह खाली पेट दक्षिण या पूर्व की तरफ सिर करके सीधे लेट गये | श्वास बाहर निकाल दिया और मल- त्याग करने की इन्द्रिय (गुदा) का संकोचन- विस्तारण किया | एक बार श्वास बाहर रोक के करने से 35 बार हो जाता है । ऐसे 3  बार करेंगे तो करीब 100 बार हो जायेगा | इसे 'स्थलबस्ती’ कहते हैं । 
इसे करने से 80 प्रकार के वायुदोष दूर होते हैं, 40 प्रकार की पित्त- संबंधी बीमारियाँ और 20 प्रकार की कफ संबंधी बीमारियाँ दूर होती हैं |
'स्थलबस्ती’ से 140 प्रकार की बीमारियाँ निकट नहीं आती हैं, अगर हैं तो भाग जाती हैं | जिसके कंधे जकड़े रहते हैं, जोड़ों में दर्द रहता हैं, शरीर जकड़ा रहता हैं वह भी स्थलबस्ती करे तो उसको भी आराम मिलेगा | इसे करने से भक्ति में भी बरकत आयेगी, व्यक्तित्व का प्रभाव भी बढ़ेगा, मन भी प्रसन्न रहेगा, कब्जियत भाग जायेगी और स्वप्नदोष, वीर्यक्षय आदि रोग मिट जायेंगे |

 

अग्निसार क्रिया
अग्निसार क्रिया

अग्नाशय को प्रभावित करने वाली यह योग की प्राचीन क्रिया लुप्त हो गयी थी । घेरण्ड ऋषि पाचन-प्रणालि को अत्यधिक सक्रिय रखने के लिए यह क्रिया करते थे । इस क्रिया से अनेक लाभ साधक को बैठे-बैठे मिल जाते हैं ।
विधिः वज्रासन में बैठकर हाथों को घुटनों पर रखें । सामने देखें । श्वास बाहर निकाल कर पेट को आगे-पीछे चलायें । पेट को चलाते वक्त श्वास बाहर ही रोक रखें । जब आप पेट चलाते हैं तब कन्धों को न हिलायें । एक बार जब तक श्वास बाहर रोकी हुई है तब तक पेट चलाते रहें । एक बार श्वास छोड़कर करीब 20 से 40 बार पेट को अंदर बाहर करें, फिर पेट चलाना बंद करें और लँबी-गहरी श्वास लेना-छोड़ना शुरू करें । चार-पाँच बार लँबी गहरी श्वास लेने छोड़ने के बाद फिर से श्वास बाहर छोड़कर पेट को चलाने की इस क्रिया को 4-5 बार दोहरायें ।
लाभः अग्निसार क्रिया से पाचन सुचारू रूप से चलता है । साधना में अधिक देर तक बैठने के बाद भी अजीर्ण नहीं होता और पेट का मोटापन कम हो जाता है । पेट के अनेक विकार दूर हो जाते हैं जैसे कब्ज (कोष्ठबद्धता), अल्सर, गैसेस, डकारें आदि की शिकायतें बंद हो जाती हैं । पेशाब में जलन कम हो जाती है । बार-बार पेशाब का आना या बहुमूत्र का होना इस क्रिया से बंद हो जाता है । भूख अच्छी लगती है । अधिक देर बैठकर साधना करने वालों को अजीर्ण आदि नहीं होता है ।