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सूर्यनमस्कार / सूर्योपासना

      सूर्य एक शक्ति है । भारत में तो सदियों से सूर्य की पूजा होती आ रही है । सूर्य तेज और स्वास्थ्य के दाता माने जाते हैं । यही कारण है कि विभिन्न जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग दैवी शक्ति के रूप में सूर्य की उपासना करते हैं ।

      ऋग्वेद में आता है कि सूर्य न केवल सम्पूर्ण विश्व के प्रकाशक, प्रवर्त्तक एवं प्रेरक हैं वरन् उनकी किरणों में आरोग्य वर्धन, दोष-निवारण की अभूतपूर्व क्षमता विद्यमान है। सूर्य की उपासना करने एवं सूर्य की किरणों का सेवन करने से अनेक शारीरिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक लाभ होते हैं।

      सूर्य की किरणों में समस्त रोगों को नष्ट करने की क्षमता विद्यमान है। सूर्य की प्रकाश – रश्मियों के द्वारा हृदय की दुर्बलता एवं हृदय रोग मिटते हैं। स्वास्थ्य, बलिष्ठता, रोगमुक्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए सूर्योपासना करनी ही चाहिए।

      सूर्य नियमितता, तेज एवं प्रकाश के प्रतीक हैं। उनकी किरणें समस्त विश्व में जीवन का संचार करती हैं। भगवान सूर्यनारायण सतत् प्रकाशित रहते हैं। वे अपने कर्त्तव्य पालन में एक क्षण के लिए भी प्रमाद नहीं करते, कभी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होते। प्रत्येक मनुष्य में भी इन सदगुणों का विकास होना चाहिए। नियमितता, लगन, परिश्रम एवं दृढ़ निश्चय द्वारा ही मनुष्य जीवन में सफल हो सकता है तथा कठिन परिस्थितियों के बीच भी अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है।जितने भी सामाजिक एवं नैतिक अपराध हैं, वे विशेषरूप से सूर्यास्त के पश्चात् अर्थात् रात्रि में ही होते हैं। सूर्य की उपस्थिति मात्र ही इन दुष्प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर देती है। सूर्य के उदय होने से समस्त विश्व में मानव, पशु-पक्षी आदि क्रियाशील होते हैं। यदि सूर्य को विश्व-समुदाय का प्रत्यक्ष देव अथवा विश्व-परिवार का मुखिया कहें तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।

      वैसे तो सूर्य की रोशनी सभी के लिए समान होती है परन्तु उपासना करके उनकी विशेष कृपा प्राप्त कर व्यक्ति सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक उन्नत हो सकता है तथा समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना सकता है।

      सूर्य बुद्धि के अधिष्ठाता देव हैं। विद्यार्थियों को प्रतिदिन स्नानादि से निवृत्त होकर एक लोटा जल सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय इस बीजमंत्र का उच्चारण करना चाहिएः

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।

      इस प्रकार मंत्रोच्चारण के साथ जल देने से तेज एवं बौद्धिक बल की प्राप्ति होती है।

      सूर्योदय के बाद जब सूर्य की लालिमा निवृत्त हो जाय तब सूर्याभिमुख होकर कंबल अथवा किसी विद्युत कुचालक आसन पर पद्मासन अथवा सुखासन में इस प्रकार बैठें ताकि सूर्य की किरणें नाभि पर पड़े। अब नाभि पर अर्थात् मणिपुर चक्र में सूर्य नारायण का ध्यान करें।

      यह बात अकाट्य सत्य है कि हम जिसका ध्यान, चिन्तन व मनन करते हैं, हमारा जीवन भी वैसा ही हो जाता है। उनके गुण हमारे जीवन में प्रगट होने लगते हैं।

      नाभि पर सूर्यदेव का ध्यान करते हुए यह दृढ़ भावना करें कि उनकी किरणों द्वारा उनके दैवी गुण आप में प्रविष्ट हो रहे हैं। अब बायें नथुने से गहरा श्वास लेते हुए यह भावना करें कि सूर्य किरणों एवं शुद्ध वायु द्वारा दैवीगुण मेरे भीतर प्रविष्ट हो रहे हैं। यथासामर्थ्य श्वास को भीतर ही रोककर रखें। तत्पश्चात् दायें नथुने से श्वास बाहर छोड़ते हुए यह भावना करें कि मेरी श्वास के साथ मेरे भीतर के रोग, विकार एवं दोष बाहर निकल रहे हैं। यहाँ भी यथासामर्थ्य श्वास को बाहर ही रोककर रखें तथा इस बार दायें नथुने से श्वास लेकर बायें नथुने से छोड़ें। इस प्रकार इस प्रयोग को प्रतिदिन दस बार करने से आप स्वयं में चमत्कारिक परिवर्तन महसूस करेंगे। कुछ ही दिनों के सतत् प्रयोग से आपको इसका लाभ दिखने लगेगा। अनेक लोगों को इस प्रयोग से चमत्कारिक लाभ हुआ है।

सूर्यनमस्कार / सूर्योपासना का महत्त्व

       हमारे ऋषियों ने मंत्र और व्यायामसहित एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसमें सूर्योपासना का समन्वय हो जाता है। इसे सूर्यनमस्कार कहते हैं। इसमें कुल 10 आसनों का समावेश है। हमारी शारीरिक शक्ति की उत्पत्ति, स्थिति एव वृद्धि सूर्य पर आधारित है। जो लोग सूर्यस्नान करते हैं, सूर्योपासना करते हैं वे सदैव स्वस्थ रहते हैं। सूर्यनमस्कार से शरीर की रक्तसंचरण प्रणाली, श्वास-प्रश्वास की कार्यप्रणाली और पाचन-प्रणाली आदि पर असरकारक प्रभाव पड़ता है। यह अनेक प्रकार के रोगों के कारणों को दूर करने में मदद करता है। सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास के शारीरिक एवं मानसिक स्फूर्ति के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति तीव्र होती है।

      आज पश्चिमी देशों में भी भारतीय सनातन संस्कृति के अनुरूप सूर्योपासना का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है, कई पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने अपनी शोधों से सूर्य की महिमा को समग्र विश्व के सामने उजागर किया है ।

      पश्चिमी वैज्ञानिक गार्डनर रॉनी ने कहाः सूर्य एक श्रेष्ठ औषध है। उससे सर्दी, खाँसी, न्युमोनिया और कोढ़ जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।

      डॉक्टर सोले ने कहाः सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की अन्य किसी चीज़ में नहीं।

सूर्य नमस्कार विधि

विधि
विधि

प्रातःकाल शौच स्नानादि से निवृत होकर कंबल या टाट (कंतान) का आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख खड़े हो जायें। चित्र के अनुसार सिद्ध स्थिति में हाथ जोड़ कर, आँखें बन्द करके, हृदय में भक्तिभाव भरकर भगवान आदिनारायण का ध्यान करें-
 

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपर्धृतशंखचक्रः।।

सवितृमण्डल के भीतर रहने वाले, पद्मासन में बैठे हुए, केयूर, मकर कुण्डल किरीटधारी तथा हार पहने हुए, शंख-चक्रधारी, स्वर्ण के सदृश देदीप्यमान शरीर वाले भगवान नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए। - (आदित्य हृदयः 938)
 
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोsस्तु ते।।
हे आदिदेव सूर्यनारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे प्रकाश प्रदान करने वाले देव! आप मुझ पर प्रसन्न हों। हे दिवाकर देव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे तेजोमय देव! आपको मेरा नमस्कार है।
 
यह प्रार्थना करने के बाद सूर्य के तेरह मंत्रों में से प्रथम मंत्र ॐ मित्राय नमः। के स्पष्ट उच्चारण के साथ हाथ जोड़ कर, सिर झुका कर सूर्य को नमस्कार करें। फिर चित्रों के निर्दिष्ट 10 स्थितियों का क्रमशः आवर्तन करें। यह एक सूर्य नमस्कार हुआ।
इस मंत्र द्वारा प्रार्थना करने के बाद निम्नांकित मंत्र में से एक-एक मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए सूर्यनमस्कार की दसों स्थितियों का क्रमबद्ध अनुसरण करें।

1. ॐ मित्राय नमः।
2. ॐ रवये नमः।
3. ॐ सूर्याय नमः।
4. ॐ भानवे नमः।
5. ॐ खगाय नमः।
6. ॐ पूष्णे नमः।
7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।
8. ॐ मरीचये नमः।
9. ॐ आदित्याय नमः।
10. ॐ सवित्रे नमः।
11. ॐ अकीय नमः।
12. ॐ भास्कराय नमः।
13. ॐ श्रीसवितृ-सूर्यनारायणाय नमः।

सिद्ध स्थितिः
सिद्ध स्थितिः

दोनों पैरों की एडियों और अंगूठे परस्पर लगे हुए,संपूर्ण शरीर तना हुआ, दृष्टि नासिकाग्र, दोनोंहथेलियाँ नमस्कार की मुद्रा में, अंगूठे सीने से लगे हुए।

पहली स्थितिः
पहली स्थितिः

नमस्कार की स्थिति में ही दोनों भुजाएँ सिर के ऊपर, हाथ सीधे, कोहनियाँ तनी हुईं, सिर और कमर से ऊपर का शरीर पीछे की झुका हुआ, दृष्टि करमूल में, पैर सीधे, घुटने तने हुए, इस स्थिति में आते हुए श्वास भीतर भरें।

दूसरी स्थितिः
दूसरी स्थितिः

 हाथ को कोहनियों से न मोड़ते हुए सामने से नीचे की ओर झुकें, दोनों हाथ-पैर सीधे, दोनोंघुटनेऔर कोहनियाँतनी हुईं, दोनों हथेलियाँ दोनों पैरों के पास जमीन के पासलगी हुईं,ललाट घुटनों से लगा हुआ, ठोड़ी उरोस्थि से लगी हुई, इस स्थितिमें श्वास को बाहर छोड़ें।

तीसरी स्थितिः
तीसरी स्थितिः

बायाँ पैर पीछे, उसका पंजा और  घुटना धरतीसे लगा हुआ, दायाँ घुटना मुड़ा हुआ, दोनों हथेलियाँ पूर्ववत्, भुजाएँ सीधी-कोहनियाँ तनी हुईं, कन्धे और मस्तक पीछे खींचेहुए, दृष्टि ऊपर, बाएँ पैर को पीछे ले जाते समय श्वास को भीतर खींचे।

चौथी स्थितिः
चौथी स्थितिः

दाहिना पैर पीछे लेकर बाएँ पैर के पास, दोनों हाथपैर सीधे, एड़ियाँ जमीन से लगी हुईं, दोनों घुटने और कोहनियाँ तनी हुईं, कमर ऊपर उठी हुई, सिर घुटनों की ओर खींचा हुआ, ठोड़ी छाती से लगी हुई, कटि और कलाईयाँ इनमें त्रिकोण, दृष्टि घुटनों की ओर, कमर को ऊपर उठाते समय श्वास को छोड़ें।

पाँचवीं स्थितिः
पाँचवीं स्थितिः

साष्टांग नमस्कार, ललाट, छाती, दोनों हथेलियाँ, दोनों घुटने, दोनों पैरों के पंजे, ये आठ अंग धरती पर टिके हुए, कमर ऊपर उठाई हुई, कोहनियाँ एक दूसरे की ओर खींची हुईं, चौथी स्थिति में श्वास बाहर ही छोड़ कर रखें।

छठी स्थितिः
छठी स्थितिः

 घुटने और जाँघे धरती से सटी हुईं, हाथ सीधे, कोहनियाँ तनी हुईं, शरीर कमर से ऊपर उठा हुआ मस्तक पीछे की ओर झुका हुआ, दृष्टि ऊपर, कमर हथेलियों की ओर खींची हुई, पैरों के पंजे स्थिर, मेरूदंड धनुषाकार, शरीर को ऊपर उठाते समय श्वास भीतर लें।
 

सातवीं स्थितिः
सातवीं स्थितिः

यह स्थिति चौथी स्थिति की पुनरावृत्ति है। कमर ऊपर उठाई हुई, दोनों हाथ पैर सीधे, दोनों घुटने और कोहनियाँ तनी हुईं, दोनों एड़ियाँ धरती पर टिकी हुईं, मस्तक घुटनों की ओर खींचा हुआ, ठोड़ी उरोस्थि से लगी हुई, एड़ियाँ, कटि और कलाईयाँ – इनमें त्रिकोण, श्वास को बाहर छोड़ें।

आठवीं स्थितिः
आठवीं स्थितिः

 बायाँ पैर आगे लाकर पैर का पंजा दोनों हथेलियों के बीच पूर्व स्थान पर, दाहिने पैर का पंजा और घुटना धरती पर टिका हुआ, दृष्टि ऊपर की ओर, इस स्थिति में आते समय श्वास भीतर को लें। (तीसरी और आठवीं स्थिति मे पीछे-आगे जाने वाला पैर प्रत्येक सूर्यनमस्कार में बदलें।)