योगासन

साधारण मनुष्य अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोष में जीता है। जीवन की तमाम सुषुप्त शक्तियाँ नहीं जगाकर जीवन व्यर्थ खोता है। इन शक्तियों को जगाने में आपको आसन खूब सहाय रूप बनेंगे। आसन के अभ्यास से तन तन्दरूस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि तीक्षण बनेगी। जीवन के हर क्षेत्र में सुखद स्वप्न साकार करने की कुँजी आपके आन्तर मन में छुपी हुई पड़ी है। आपका अदभुत सामर्थ्य प्रकट करने के लिए ऋषियों ने समाधी से सम्प्राप्त इन आसनों का अवलोकन किया है।

हजारों वर्ष की कसौटियों में कसे हुए, देश-विदेश में आदरणीय लोगों के द्वारा आदर पाये हुए इन आसनों की पुस्तिका देखने में छोटी है पर आपके जीवन को अति महान बनाने की कुँजियाँ रखती हुई आपके हाथ में पहुँच रही है।

आसनों का अभ्यास करो। हिम्मत रखो। अभ्यास का सातत्य जारी रखो। अदभुत लाभ होगा....... होगा........ अवश्य होगा।

संत श्री आसारामजी बापू



आवश्यक निर्देश

  1. भोजन के छः घण्टे बाद, दूध पीने के दो घण्टे बाद या बिल्कुल खाली पेट ही आसन करें।
  2. शौच-स्नानादि से निवृत्त होकर आसन किये जाये तो अच्छा है।
  3. श्वास मुँह से न लेकर नाक से ही लेना चाहिए।
  4. गरम कम्बल, टाट या ऐसा ही कुछ बिछाकर आसन करें। खुली भूमि पर बिना कुछ बिछाये आसन कभी न करें, जिससे शरीर में निर्मित होने वाला विद्युत-प्रवाह नष्ट न हो जायें।
  5. आसन करते समय शरीर के साथ ज़बरदस्ती न करें। आसन कसरत नहीं है। अतः धैर्यपूर्वक आसन करें।
  6. आसन करने के बाद ठंड में या तेज हवा में न निकलें। स्नान करना हो तो थोड़ी देर बाद करें।
  7. आसन करते समय शरीर पर कम से कम वस्त्र और ढीले होने चाहिए।
  8. आसन करते-करते और मध्यान्तर में और अंत में शवासन करके, शिथिलीकरण के द्वारा शरीर के तंग बने स्नायुओं को आराम दें।
  9. आसन के बाद मूत्रत्याग अवश्य करें जिससे एकत्रित दूषित तत्त्व बाहर निकल जायें।
  10. आसन करते समय आसन में बताए हुए चक्रों पर ध्यान करने से और मानसिक जप करने से अधिक लाभ होता है।
  11. आसन के बाद थोड़ा ताजा जल पीना लाभदायक है. ऑक्सिजन और हाइड्रोजन में विभाजित होकर सन्धि-स्थानों का मल निकालने में जल बहुत आवश्यक होता है।
  12. स्त्रियों को चाहिए कि गर्भावस्था में तथा मासिक धर्म की अवधि में वे कोई भी आसन कभी न करें।
  13. स्वास्थ्य के आकांक्षी हर व्यक्ति को पाँच-छः तुलसी के पत्ते प्रातः चबाकर पानी पीना चाहिए। इससे स्मरणशक्ति बढ़ती है, एसीडीटी एवं अन्य रोगों में लाभ होता है।

Yogasanas

ताड़ासन
ताड़ासन

क्या आप अपनी लम्बाई बढ़ाना चाहते हैं? अपनी ऊर्जाशक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य ताड़ासन का अभ्यास कीजिए। 
परिचयः इस आसन में शरीर की स्थिति ताड़ या खजूर के वृक्ष के समान लम्बी होती है, अतः इसे ताड़ासन कहते हैं।

लाभः इस आसन से स्फूर्ति, प्रसन्नता, जागरूकता व नेत्रज्योति में वृद्धि होती है। बच्चे व युवा यदि ताड़ासन और पादपश्चिमोत्तानासन का प्रतिदिन अभ्यास करें तो शऱीर का कद बढ़ाने में मदद मिलती है।

विधिः दोनों पैरों के बीच में 4 से 6 इंच का फासला रखकर सीधे खड़े हो जायें। हाथों को शरीर से सटा कर रखें। एड़ियाँ ऊपर उठाते समय श्वास अंदर भरते हुए दोनों हाथ सिर से ऊपर उठायें। पैरों के पंजों पर खड़े रहकर शरीर को पूरी तरह ऊपर की ओर खींचें। सिर सीधा व दृष्टि आकाश की ओर रहे। हथेलियाँ आमने-सामने हों। श्वास भीतर रोके हुए यथाशक्ति इसी स्थिति में खड़े रहें। श्वासछोड़ते हुए एड़ियाँ जमीन पर वापिस लायें। हाथनीचे लाकर मूल स्थिति में आ जायें।
समयः आधा-आधा मिनट तक तीन बार करें।इसकी समयावधि बढ़ाकर एक साथ एक से तीनतक भी कर सकते हैं। (एक साथ तीन मिनटतक करना हो तो यथाशक्ति श्वास रोकें फिरधीरे-धीरे छोड़ें। पुनः श्वास लेकर रोकें)।

रोगों में लाभः इसके नियमित अभ्यास सेस्वप्नदोष, वीर्यविकार, धातुक्षय जैसी बीमारियोंमें लाभ होता है। दमे के रोगियों के लिए यहआसन बड़ा ही लाभप्रद है।

पद्मासन
पद्मासन

क्या आप सदैव प्रसन्न रहना चाहते हैं? अपना मनोबल व आत्मबल बढ़ाना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य पद्मासन का अभ्यास कीजिये। 
परिचयः इस आसन में पैरों का आकार पद्म अर्थात कमल जैसा बनने से इसको पद्मासन या कमलासन कहा जाता है।
लाभः इस आसन से मन स्थिर और एकाग्र होता है। पद्मासन के नित्य अभ्यास से स्वभाव में प्रसन्नता बढ़ती है, मुख तेजस्वी बनता है व जीवनशक्ति का विकास होता है। इससे आत्मबल व मनोबल भी खूब बढ़ता है। इस आसन से पेट व पीठ के स्नायु मजबूत बनते हैं व बुद्धि तीव्र होती है।

विधिः बिछे हुए आसन पर बैठ जाएँ व पैर खुलेछोड़ दें। श्वास छोड़ते हुए दाहिने पैर को मोड़करबायीं जंघा पर ऐसे रखें कि एड़ी नाभि के नीचेआये। इसी प्रकार बायें पैर को मोड़कर दायीं जंघापर रखें। पैरों का क्रम बदल भी सकते हैं। दोनोंहाथ दोनों घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रहें व दोनोंघुटने ज़मीन से लगे रहें। अब गहरा श्वास भीतरभरें। कुछ समय तक श्वास रोकें, फिर धीरे-धीरछोड़ें। ध्यान आज्ञाचक्र में हो, आँखें अर्धोन्मीलितहों अर्थात् आधी खुली, आधी बंद। सिर, गर्दन,छाती, मेरुदंड आदि पूरा भाग सीधा और तनाहुआ हो।
प्रारम्भिक समयः 5 से 10 मिनट। धीरे-धीरे इसका समय बढ़ा सकते हैं। ध्यान, जप, प्राणायाम आदि करने के लिए यह मुख्य आसन है। इस आसन में बैठकर आज्ञाचक्र पर गुरु अथवा इष्ट का ध्यान करने से बहुत लाभ होता है।

रोगों में लाभः यह आसन मंदाग्नि, पेट के कृमि व मोटापा दूर करने में लाभदाय़क है। इसका नियमित अभ्यास दमा, अनिद्रा, हिस्टीरिया आदि रोगों को दूर करने में सहायकहै।
सावधानीः कमजोर घुटनोंवाले, अशक्त या रोगी व्यक्ति जबरदस्ती हठपूर्वक इस आसन में न बैठें।

पादपश्चिमोत्तानासन
पादपश्चिमोत्तानासन

क्या आप अपनी लम्बाई बढ़ाना चाहते हैं? विकारी, क्रोधी स्वभाव पर नियंत्रण पाकर संयमी, धैर्यवान और साहसी बनना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य पादपश्चिमोत्तानासन का अभ्यास कीजिये। 
परिचयः यह आसन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। भगवान शिव ने मुक्तकंठ से इस आसन की प्रशंसा करते हुए कहा हैः ‘यह आसन सर्वश्रेष्ठ है।’ इसे करते समय ध्यान मणिपुर चक्र में स्थित हो।
लाभः चिंता एवं उत्तेजना शांत करने के लिए यह आसन उत्तम है। इस आसन से उदर, छाती और मेरुदण्ड की कार्यक्षमता बढ़ती है। संधिस्थान मजबूत बनते हैं और जठराग्नि प्रदीप्त होती है। पेट के कीड़े अनायास ही मर जाते हैं।

विधिः बैठकर दोनों पैरों को सामने लंबा फैला दें।श्वास भीतर भरते हुए दोनों हाथों को ऊपर की ओरलंबा करें। श्वास रोके हुए दाहिने हाथ की तर्जनी औरअँगूठे से दाहिने पैर का अँगूठा और बायें हाथ कीतर्जनी और अँगूठे से बायें पैर का अँगूठा पकड़ें। श्वास छोड़ते हुए नीचे झुकें और सिर दोनों घुटनों के मध्य में रखें। ललाट घुटने को स्पर्श करे और घुटने जमीन से लगे रहें। हाथ की दोनों कोहनियाँ घुटनों के पास जमीन से लगी रहें। सामान्य श्वास-प्रश्वास करते हुए इस स्थिति में यथाशक्ति पड़े रहें। धीरे-धीरे श्वास भीतर भरते हुए मूल स्थिति में आ जायें।
समयः प्रारम्भ में आधा मिनट इस आसन को करते हुए धीरे-धीरे 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं।
ध्यान दें- आप अवश्य इस आसन का लाभ लेना। प्रारंभ के चार-पाँच दिन जरा कठिन लगेगा लेकिन थोड़े दिनों के नियमित अभ्यास के पश्चात आप सहजता से यह आसन कर सकेंगे। यह निश्चित ही स्वास्थ्य का साम्राज्य स्थापित कर देगा।
रोगों में लाभः मन को गंदे विचारों से बचाकर संयमित करने हेतु इस आसन का नियमित अभ्यास करना चाहिए। इसके अभ्यास से स्वप्नदोष, वीर्यविकार व रक्तविकार रोग दूर होते हैं।
मंदाग्नि, अजीर्ण, पेट के रोग, सर्दी, खाँसी, कमर का दर्द, हिचकी, अनिद्रा, ज्ञानतंतुओँ की दुर्बलता, नल की सूजन आदि बहुत से रोग इसके अभ्यास से दूर होते हैं। मधुप्रमेह, आंत्रपुच्छ शोथ (अपेन्डिसाइटिस), दमा, बवासीर आदि रोगों में भी यह अति लाभदायक है।

वज्रासन
वज्रासन

क्या आप अपनी स्मरणशक्ति और रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य वज्रासन का अभ्यास कीजिये। 

परिचयः इस आसन का नियमित अभ्यास करने से शरीर वज्र के समान शक्तिशाली हो जाता है। इसीलिये इसे वज्रासन कहते हैं। यह आसन करते समय ध्यान मूलाधार चक्र में स्थित करें।
लाभः पाचनशक्ति व स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है एवं आँखोंकी ज्योति तीव्र होती है। रक्त के श्वेतकणों की संख्या मेंवृद्धि होती है, जिससे रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है।

विधिः दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर दोनों एड़ियों पर बैठजायें। पैरों के तलवों के ऊपर नितम्ब रहें व दोनों अँगूठेपरस्पर लगे रहें। कमर और पीठ बिल्कुल सीधी रहे।दोनों बाजुओं को कोहनियों से मोड़े बिना हाथ घुटनों पररख दें। हथेलियाँ नीचे की ओर रहें व दृष्टि सामने स्थिरकर दें।
विशेषः भोजन करने के बाद इस आसन में बैठने से भोजनजल्दी पच जाता है।

रोगों में लाभः मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) से पीड़ित व्यक्ति अगर इस आसन में प्रतिदिन बैठे तो उसके जीवन में प्रसन्नता व शारीरिक स्फूर्ति आती है।
 

शवासन
शवासन

क्या आप अपनी मनःशक्ति को बढ़ाना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य शवासन का अभ्यास कीजिए। 
परिचयः इस आसन की पूर्णावस्था में शरीर की स्थिति मृतक व्यक्ति जैसी हो जाती है, अतः इसे शवासन कहते हैं।

लाभः अन्य आसन करने के बाद में जो तनाव होता है, उसको दूर करने के लिए अंत में तीन से पाँच मिनट तक शवासन करना चाहिए। अन्य समय में भी इसे कर सकते हैं। इससे रक्तवाहिनियों में रक्तप्रवाह तीव्र होने से शारीरिक, मानसिक थकान उतर जाती है। इस आसन के द्वारा स्नायु एवं मांसपेशियों का शिथिलीकरण होता है, जिससे उनकी शक्ति बढ़ती है।

विधिः सीधे लेट जायें, दोनों पैरों को एक दूसरे से थोड़ा अलग कर दें व दोनों हाथ भी शरीर से अलग रहें। पूरे शरीर को मृतकव्यक्ति के शरीर की तरह ढीला 
छोड़ दें।सिर सीधा रहे व आँखें बंद। हाथ कीहथेलियाँ आकाश की तरफ खुली रखें।मानसिक दृष्टि से शरीर को पैर से सिरतक देखते जायें। बारी-बारी से एक-एक अंग पर मानसिक दृष्टि एकाग्र करते हुए भावना करें कि वह अंग अब आराम पा रहा है। ऐसा करने से मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है। ध्यान रहे कि शरीर के किसी भी अंग में कहीं भी तनाव न रहे। शिथिलीकरण की प्रक्रिया में पैर से प्रारंभ कर के सिर तक जायें अथवा सिर से प्रारंभ कर के पैर तक भी जा सकते हैं। जहाँ से आरम्भ किया हो वहीं पुनः पहुँचना चाहिए।

ध्यान दें- शवासन करते समय निद्रित न होकर जाग्रत रहना आवश्यक है। फिर श्वासोच्छ्वास पर ध्यान देना है। शवासन की यह मुख्य प्रक्रिया है। श्वास और उच्छवास दीर्घ व सम रहें।

रोगों में लाभः नाड़ीतंत्र की दुर्बलता दूर होती है। इस आसन को करने से हृदय की तकलीफों व मानसिक रोगों में शीघ्र आराम प्राप्त होता है।

समयः 2-3 आसन के बाद 1 मिनट तक शवासन करना चाहिए। सभी आसनों के अंत में 10 से 15 मिनट तक करें।


 

शशकासन
शशकासन

क्या आप अपने जिद्दी और क्रोधी स्वभाव पर नियंत्रण पाना चाहते हैं? अपनी निर्णयशक्ति बढ़ाना चाहते हैं? आज्ञाचक्र का विकास कर आप हर क्षेत्र में सफल होना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य शशकासन का अभ्यास कीजिये। 
लाभः यह आसन कटि प्रदेश की मांसपेशियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसके अभ्यास से सायटिका की तंत्रिका व एड्रिनल ग्रंथि के कार्य संतुलित होते हैं। आज्ञाचक्र का विकास होता है, निर्णयशक्ति बढ़ती है। जिद्दी व क्रोधी स्वभाव पर भी नियंत्रण होता है।
विधिः प्रकार 1. वज्रासन में बैठ जायें। श्वास लेते हुएबाजुओं को ऊपर उठायें व हाथों को नमस्कार कीस्थिति में जोड़ दें। श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे
झुककर मस्तक जमीन पर लगा दें। जोड़े हुए हाथोंको शरीर के सामने जमीन पर रखें व सामान्यश्वास-प्रश्वास करें। धीरे-धीरे श्वास लेते हुए हाथ, सिर उठाते हुए मूल स्थिति में आ जायें।

प्रकार-2. इसमें कमर के पीछे दाहिनी कलाईको बायें हाथ से पकड़ लें। अँगूठा अन्दर रखतेहुए दाहिने हाथ की मुटठी बाँध लें। बाकी प्रक्रियाप्रकार 1 के अनुसार करें।

प्रकार-3. इसमें दोनों हाथों की मुट्ठियाँ जंघामूलपर पेड़ू से सटाकर रखें। दोनों हाथों की कनिष्ठकाएँजांघों पर तथा अँगूठा ऊपर रहे। बाकी प्रक्रियाप्रकार 1 के अनुसार करें।
नोटः दोनों हाथों को जमीन पर फैलाकर भी यहआसन कर सकते हैं।

विशेषः ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का मानसिक जप व गुरुदेव, इष्टदेव की प्रार्थना-ध्यान करते हुए शरणागति भाव से इस स्थिति में पड़े रहने से भगवान और 


सदगुरु के चरणों में प्रीति बढ़ती है व जीवन उन्नत होता है। रोज सोने से पहले व सवेरे उठने के तुरंत बाद 5 से 10 मिनट तक ऐसा करें।

सर्वांगासन
सर्वांगासन

क्या आप अपने नेत्रों और मस्तिष्क की शक्ति बढ़ाना चाहते हैं? क्या आप अपनी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य सर्वांगासन का अभ्यास कीजिये। 
परिचयः इस आसन में समग्र शरीर को ऊपर उठाया जाता है। उस समय शरीर के सभी अंग सक्रिय रहते हैं। इसीलिए इसे सर्वांगासन कहते हैं।
लाभः यह आसन मेधाशक्ति को बढ़ाने वाला व चिरयौवन की प्राप्ति कराने वाला है। विद्यार्थियों को तथा मानसिक, बौद्धिक कार्य करने वाले लोगों को यह आसन अवश्य करना चाहिए। इससे नेत्रों और मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है। इस आसन को करने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है व स्वप्नदोष जैसे रोगों का नाश होता 
है। सर्वांगासन के नित्य अभ्यास से जठराग्नि तीव्र होती है, त्वचा लटकती नहीं तथा झुर्रियाँ नहीं पड़तीं।

विधिः बिछे हुए आसन पर लेट जायें। श्वास लेकरभीतर रोकें व कमर से दोनों पैरों तक का भागऊपर उठायें। दोनों हाथों से कमर को आधार देतेहुए पीठ का भागभी ऊपर उठायें। अब सामान्यश्वास-प्रश्वास करें। हाथ की कोहनियाँ भूमि से लगीरहें व ठोढ़ी छाती के साथ चिपकी रहे। गर्दन औरकंधे के बल पूरा शरीर ऊपर कीओर सीधा खड़ाकर दें। दृष्टि पैर के दोनों अँगूठों पर हो। गहराश्वास लें, फिरश्वास बाहर निकाल दें। श्वास बाहररोक कर गुदा व नाभि के स्थान को अंदर सिकोड़लें व ‘ॐ अर्यमायै नमः’ मंत्र का मानसिक जपकरें। अब गुदा को पूर्व स्थिति में लायें। फिर सेऐसा करें, 3 से 5 बार ऐसा करने के बाद गहरा श्वास लें। श्वास भीतर भरते हुए ऐसा भाव करें कि ‘मेरी ऊर्जाशक्ति ऊर्ध्वगामी होकर सहस्रार चक्र में प्रवाहित हो रही है। मेरे जीवन में संयम बढ़ रहा है। फिर श्वास बाहर छोड़ते हुए उपर्युक्त विधि को दोहरायें। ऐसा 5 बार कर सकते हैं। सर्वांगासन की स्थिति में दोनों पैरों को जांघों पर लगाकर पद्मासन किया जा सकता है।
समयः सामान्यतः एक से पाँच मिनट तक यह आसन करें। क्रमशः 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं।
रोगों में लाभः थायराइड नामक अंतः ग्रंथि में रक्त संचार तीव्र गति से होने लगता है, जिससे थायराइड के अल्प विकासवाले रोगी के लाभ होता है।
सावधानीः थायराइड के अति विकास वाले, उच्च रक्तचाप, खूब कमजोर हृदयवाले और अत्यधिक चर्बीवाले लोग यह आसन न करें।

 

हलासन
हलासन

क्या आप अपने शरीर को फुर्तीला बनाना चाहते हैं? हाँ तो आप नित्य हलासन का अभ्यास कीजिए। 
परिचयः इस आसन में शरीर का आकार हल जैसा बन जाता है, इसलिए इसे हलासन कहते हैं। यह आसन करते समय ध्यान विशुद्धाख्य चक्र में रखें।
लाभः युवावस्था जैसी स्फूर्ति बनाये रखने वाला व पेट की चर्बी कम करने वाला यह अदभुत आसन है। इस आसन के नियमित अभ्यास से शरीर बलवान व तेजस्वी बनता है और रक्त की शुद्धि होती है।

विधिः सीधे लेट जायें, श्वास लेकर भीतर रोकें।अब दोनों पैरों को एक साथ धीरे-धीरे ऊपर लेजायें। पैर बिल्कुल सीधे, तने हुए रखकर पीछेसिर की तरफ झुकायें व पंजे जमीन पर लगायें।ठोढ़ी छाती से लगी रहे। फिर सामान्य श्वास-प्रश्वास करें। श्वासलेकर रोकें व धीरे-धीरे मूलस्थिति में आ जायें।
समयः एक से तीन मिनट।
रोगों में लाभः इस आसन के अभ्यास से लीवर की कमजोरी दूर होती है। मधुमेह अर्थात् डायबिटीज़, दमा, संधिवात, अजीर्ण, कब्ज आदि रोगों में यह अत्यंत लाभदायक है। पीठ, कमर की कमजोरी दूर होती है, सिर एवं गले का दर्द तथा पेट की बीमारियाँ दूर होती हैं।