जीवन जीने की कला - प्रश्नोतरी

जीवन जीने की कला - प्रश्नोतरी

संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचनों को अपनाकर सीखें जीवन जीने की कला  ।


1. प्रश्न  - भगवत्प्रीति, भगवदरस कैसे बढ़ते हैं ?


उत्तर - भगवन्नाम का जप करो । जप करते-करते ध्यान करो और सत्शास्त्रों, भगवद्भभक्तों के चरित्र का अध्ययन करो । लोककथा व जगवार्ता से अपने को बचाओ । कोई कुछ कह रहा हो तो सुन लिया, -'हूँ-हाँ' कर लिया परन्तु अंदर से समझो कि 'यह सब सपना है । भूतकाल की बातें है । किसी के मन का वमन है । मन ! इसे तू क्यों चाटेगा ? तू तो हरिरस पी ।' इस तरह मन को समझाकर अंतर में भगवन्नाम-जप, भगवद्भभाव, भगवद्प्रीति बढाते जायें ।


2. प्रश्न  - किन बातों का ध्यान रखने से संकल्प-शक्ति बढ़ती व किन बातों से नष्ट होती है ?


उत्तर - भगवान का भजन, सदाचार, सदविचार, सत्कर्म, तप व संयम से संकल्प-शक्ति बलवान होती है और अंत: करण में सहज में ही सुख प्राप्त होता है ।


*इन छ: बातों का ध्यान रखने से मनुष्य का पुण्य एवं प्रभाव बढ़ता है ।*


अत्याचार, अनाचार (अशुद्ध आचरण), पापाचार (पापपूर्ण आचरण) तथा परपुरूष या परस्त्री के साथ व्यभिचार करने से संकल्प-शक्ति नष्ट होती है एवं पाप- ताप बढ़ता है । इन चार दुष्कृत्यों को करने से प्रतिष्ठा नष्ट होती है, पुण्य और प्रभाव भी नष्ट हो जाते हैं ।


3. प्रश्न  - संसार में गिरने से कैसे बचें ? 


उत्तर - ईश्वर, गुरु, शास्त्र और दृढ़ श्रद्धा का आश्रय लें । अपना नियम पक्का रखें तो भगवान रक्षा करते हैं । क्षमा का सद्गुण तथा थोड़ी सहनशक्ति बढायें तो कितनी भी- कैसी भी समस्याएँ आयें तो भी आप उनमें फँसोगे नहीं, बिल्कुल बच जाओगे ।


4. प्रश्न  - संसार में गिरने से कैसे बचें ? 


उत्तर - ईश्वर, गुरु , शास्त्र और दृढ़ श्रद्धा का आश्रय लें । अपना नियम पक्का रखें तो भगवान रक्षा करते हैं । क्षमा का सद्गुण तथा थोड़ी सहनशक्ति बढायें तो कितनी भी- कैसी भी समस्याएँ आयें तो भी आप उनमें फँसोगे नहीं, बिल्कुल बच जाओगे ।


5. प्रश्न - शरीर , चित्त, वाणी और धन की शुद्धि कैसे होती है ? 


उत्तर - झूठ, कपट, हिंसा और व्यभिचार का त्याग करने से शरीर की शुद्धि होती है । चित्त की शुद्धि ध्यान करने से और व्यवहार में विवेक रखने से होती है । चित्त-शुद्धि से सामर्थ्य आता है, शक्ति बढ़ती है एवं सिद्धियाँ आती हैं । वाणी की शुद्धि भगवन्नाम-जप से होती है और धन की शुद्धि दान से होती है ।


6. प्रश्न  -  हम दुःखी क्यों हैं ?


उत्तर -  दुनिया परम सुहृदय ईश्वर ने बनायी है और वह परम दयालु है, परम हितैषी व  परम बुद्धिमान है । वह किसी को दुःख देना नहीं चाहता । ऐसा कौन - सा पिता है जो बच्चों को दुःखी देखना चाहेगा ? ऐसा कौन- सा गुरु है जो शिष्यों को दुःखी देखना चाहेगा ? जब गुरु और पिता ही हमें दुःखी नहीं देख सकते तो इनमें जो वात्सल्य है वह तो भगवान का ही है, फिर भगवान हमें दुःखी कैसे देख सकते हैं ? इसलिए दुःख न भगवान ने बनाया है, न प्रकृति ने बनाया है, दुःखी की अपनी गलती से दुःख है । वह संसार के साधनों से दुःखी होना चाहता है , यह  एक गलती है । दूसरी गलती है कि वह संसार के साधनों से, सुविधाओं से दुःख मिटाना चाहता है । दुःखी व्यक्ति स्वयं तो है शाश्वत और नश्वर को पाकर दुःख मिटाना चाहता है, यह संभव ही नहीं है इसलिए दुःख नहीं मिटते । हरि के ज्ञान से , हरि के आनंद से दुःख सदा के लिए मिट जाते हैं पर इसका उसे पता नहीं है ।

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