सुख पाने का एकमात्र उपाय

सुख पाने का एकमात्र उपाय

    प्रत्येक प्राणी के कर्म का उद्देश्य है, सभी दुःखों का नाश और सुख की प्राप्ति । हम जो भी प्रवृत्ति करते हैं सुख के लिए ही करते हैं । हमारा उद्देश्य तो अच्छा है परन्तु प्रयत्न गलत है । सुख-दुःख हमारे मन की कल्पना है । उस कल्पना को जब हम किसी बाह्य परिस्थिति से जोड़ देते हैं तो  समझते हैं कि अमुक परिस्थिति ने मुझे दुःख दिया अथवा सुख दिया ।

इसीको अज्ञान कहते हैं । सुख-दुःख का मूल हमारे मन में है । जब ब्रह्मज्ञानी गुरु की कृपा से वह मूल पकड़ में आता है तब असली सुख का पता लगता है ।

    सुख-दुःख, मान-अपमान सब मन के द्वंद हैं । जब तक मन के पार होने की यात्रा नहीं की तब तक ये आते-जाते ही रहेंगे । तो फिर अभी से मन से पार पहुँचने की यात्रा आरंभ कर लो । जब मन सुखी-दुःखी हो तब तुम मन के साक्षी बनकर उसके क्रियाकलापों को देखते रहो । उसी समय तुमको अहसास होगा कि तुम मन से अलग हो । बस, इसी अभ्यास को बढ़ाते रहो । हर परिस्थिति का अनुभव मन करता है और तुम मन भी दृष्टा बन जाओ । परिस्थितियों से तथा उनके कारण मन में उत्पन्न क्षोभ से जुड़ना मत अपितु किनारे खड़े रहकर सारा खेल देखते रहना ।

     यदि यह अभ्यास पक्का हो गया तो सुख और दुःख के द्वंदों से परे जो आत्मा का नित्य एवं शाश्वत आनंद है, वह मिलने लगेगा । इस आनंद को एक बार चख लिया तो सुख और दुःख का धंधा ही बंद हो जाएगा ।

     जिस प्रकार वस्त्र शरीर से अलग है उसी प्रकार आत्मा शरीर एवं मन से अलग है । जिस प्रकार आकाश तत्त्व शरीर के मरने मिटने पर भी ज्यों-का-त्यों रहता है ऐसे ही चिदाकाशस्वरुप आत्मा-परमात्मा सबमें ओत-प्रोत रहते हुए भी सबसे न्यारा है । सब उसी आत्मा से ऊर्जा लेकर कार्य करते हैं ।

      सर्दी-गर्मी शरीर के, भूख-प्यास प्राणों के, सुख-दुःख मन के एवं राग-द्वेष बुद्धि के विकार हैं परन्तु इन सबको अनुभव करने की शक्ति जिससे मिलती है, वह अमर आत्मा तुम हो ।

      हे अमृतस्वरुप आत्मा ! बाहर के सुख-दुःखादि द्वंदों को सत्य मानकर उनमें ही कब तक उलझते रहोगे ? अब सुख-दुःख से परे जो आत्मानंद है, उसे पाने की यात्रा कर लो और सुख-दुःख के झंझटों से सदा के लिए मुक्त हो जाओ । असली एवं अमिट सुख को पाने का यही एकमात्र उपाय है ।

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