गर्भ में मिले भक्ति के संस्कार, प्रकट किया ईश्वर साकार

गर्भ में मिले भक्ति के संस्कार, प्रकट किया ईश्वर साकार

संत-सेवी, सत्संगी, भगवत्परायण, संस्कारी माता-पिताओं का समाज पर बड़ा उपकार है । ऐसे ही अन्य परिजन जो संतानों में उत्तम संस्कारों के सिंचन हेतु प्रयासरत रहते हैं वे भी धन्यवाद के पात्र हैं ।

मीराबाई के दादा राव दूदाजी संतों में बड़ी आस्था रखते थे । वे किसी-न-किसी संत को मेड़ता आमंत्रित करके उनकी सत्संग-सरिता में पूरे राजपरिवार सहित अवगाहन करके धन्यता का अनुभव करते थे । राव दूदाजी की श्रद्धा-भक्ति के कारण कोई-न-कोई संत उनके यहाँ पधारते रहते थे । मीरा जब माँ के गर्भ में थीं उस समय दूदाजी ने एक संत से भागवत-कथा करने के लिए प्रार्थना की और अपनी पुत्रवधू झालीजी (वीर कुँवरीजी) को मन लगाकर प्रवचन सुनने को कहा । 9 महीने तक कथा चलती रही ।

झालीजी बड़ी ही श्रद्धा व एकाग्रता के साथ कथा श्रवण करतीं और बड़े ही गूढ़ प्रश्न पुछवातीं, जैसे एक दिन उन्होंने पुछवाया कि ‘जो पूर्णकाम है उसे ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ की कामना क्यों हुई ?’ एक दिन और पुछवाया कि ‘यदि माया भगवान के सामने टिक नहीं सकती तो क्या उसकी सृष्टि किसी और ने की है ?’... इस प्रकार उन्होंने आध्यात्मिक जिज्ञासाभरे प्रश्न किये । इससे उनकी भगवत्संबंधी जिज्ञासा व सूक्ष्म मति स्पष्ट होती है । झालीजी के जिज्ञासाभरे प्रश्नों से यह लगता कि आनेवाली संतान अवश्य महामना होगी ।

संवत् 1561 (1504 ई.), आश्विनी पूर्णिमा को झालीजी के यहाँ मीराबाई का जन्म हुआ । झालीजी ने संतान को बचपन से भगवद्भक्ति के संस्कार दिये । 6 माह की मीरा एक दिन ऐसी रोने लगी कि किसी प्रकार चुप नहीं होती थी । बहलाने के सभी प्रयत्न विफल हुए तो दूदाजी उसे लेकर मंदिर गये । ठाकुरजी पर दृष्टि पड़ते ही वह चुप हो गयी और उन्हें एकटक देखने लगी । उस दिन से उसके रोने पर उसे चुप कराने का यह सरल उपाय मिल गया । मीरा के भक्ति के संस्कारों का दूदाजी पोषण करने लगे । मीरा एक वर्ष की हुई तो उसने छोटे-छोटे कितने ही कीर्तन सीख लिये थे । वह अपनी तोतली बोली में गाकर दूदाजी को भजन सुनाती थी । जब-जब संतों का पधारना होता, मीरा दूदाजी की प्रेरणा से उन्हें प्रणाम करती । कथा-वार्ता के समय शांत बैठकर उसे सुनती । बचपन में उसे एक संत से भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति मिली । वह उसे हमेशा साथ रखती थी ।

एक बेटी के कितने बींद ?

बचपन में मीराबाई ने माँ से अपने पति के बारे में पूछा तब माँ ने यह बताया कि ‘तेरा पति तो गिरधर गोपाल है ।’ तब से यही उसके जीवन का मूलमंत्र बन गया । मेवाड़ के महाराज कुँवर से सगाई होने की बात मीरा ने सुनी तो दूदाजी के पास जाकर बोली : ‘‘एक बेटी के कितने बींद (पति) होते हैं ?’’

दूदाजी : ‘‘एक ही ।’’

‘‘मेरा तो एक पति गिरधर गोपाल है, फिर मेरा विवाह मेवाड़ के राजकुमार से क्यों ?’’ - मीरा रोते हुए बोली ।

‘‘तू चिंता मत कर । मेरे जीते-जी तेरा विवाह नहीं होगा । तेरा वर गिरधर गोपाल है और वही रहेगा । मेरे मरने के बाद यदि ये लोग तेरा विवाह कर दें तो तू घबराना मत । तेरा सच्चा पति तो वह अंतर्यामी है, भले तन का कोई और पति बने । मन की बात उससे छिपी नहीं है बेटी ! तू निश्चिंत रह ।’’ मीरा के मन को तसल्ली मिली ।

‘मेरे गुरु कौन ?’

एक बार गुरुपूर्णिमा से एक दिन पहले मीराबाई सोच रही थीं कि ‘शास्त्र और संत कहते हैं कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता । गुरु ही परम तत्त्व के दाता हैं । तब मेरे गुरु कौन ?’ मीराबाई सद्गुरुप्राप्ति के लिए व्याकुल हो गिरधर से प्रार्थना करने लगीं ।

मोहि लागि लगन गुरु चरनन की ।

चरन बिना मोहे कछु नहिं भावे,

जग माया सब सपनन की ।।

भवसागर सब सूख गयो है,

फिकर नहीं मोही तरनन की ।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर,

आस लगी गुरु सरनन की ।।

रात को प्रार्थना करते-करते मीरा सो गयीं । स्वप्न में कुछ संकेत मिला और सुबह उठकर मीराबाई ने निश्चय किया कि ‘गिरधर गोपाल ! आज तुम जिन संत के रूप में पधारोगे, मैं उनको ही गुरु मान लूँगी ।’ सायंकाल अकस्मात् संत रैदासजी पहुँचे । मीरा ने प्रसन्न होकर उन्हें प्रणाम किया और स्वयं को शिष्या के रूप में स्वीकारने हेतु विनती की ।

सद्गुरु तो परम दयालु होते हैं । गुरु रैदासजी ने मीराबाई की प्रार्थना स्वीकार कर ली । उनका सत्संग सुन के मीराबाई को बहुत शांति का अनुभव हुआ । वे कहती हैं :

...जनम-जनम का सोया मनुवा,

सतगुरु सबद सुन जागा ।।

गुरुदेव जाने लगे तो मीरा बहुत उदास हो गयीं । रैदासजी समझाते हुए बोले : ‘‘बेटी ! सद्गुरु से प्राप्त भगवन्नाम ही निसेनी (सीढ़ी) है और ईश्वरप्राप्ति की लगन ही प्रयास है । दोनों ही बढ़ते जायें तो अगम अटारी (परम पद - परमात्मा) घट (हृदय) में प्रकाशित हो जायेगी । इन्हींके सहारे उसमें पहुँच के अमृतपान कर लोगी । समय जैसा भी आये, पाँव पीछे न हटे, फिर तो बेड़ा पार है ।’’

मीराबाई के माता-पिता तो उनकी शादी कराके निश्चिंत होना चाह रहे थे लेकिन मीराबाई का मन भक्ति में लग रहा था । उन्होंने कहा है :

मात-पिता-कुटुम्ब-कबीला,

सब मतलब के गरजी1 ।

मीरा के रविदास गुरु हैं,

हरि की मिलि डगर जी ।

मीरा तो सद्गुरु से प्राप्त मार्गदर्शनानुसार साधना में लग गयीं । सद्गुरु का दर्शन-सत्संग मिलने के बाद मीराबाई ने अपने पदों में जगह-जगह पर सद्गुरु की महत्ता का वर्णन किया है :

सतगुर मिलि या सुंज पिछानी2,

ऐसा ब्रह्म मैं पाती ।

सगुरा सूरा अमृत पीवै, निगुरा प्यासा जाती ।।

आगे मीराबाई ने कहा है :

रैदास संत मिले मोहि सतगुरु,

दीन्हा सुरत सहदानी3 ।

मैं मिली जाय पाय पिय अपना,

तब मोरी पीर बुझानी ।।

जिस आनंद में संत रैदास रमण करते थे, उस आनंद की एक बूँद मीरा को मिली तो वे भी उसमें सराबोर रहने लगीं । संतों-महापुरुषों का बाह्य वेश या व्यवहार देखकर ही उनके बारे में कुछ भी अनुमान लगा लेनेवाले अथवा निंदकों के चक्कर में आनेवाले यूँ ही कोरे, अभागे रह जाते हैं, संतों के कृपा-प्रसाद को तो वे ही पचा पाते हैं जो निरभिमानी होकर उनके श्रीचरणों में नतमस्तक होते हैं । मीरा ने पहचाना था रैदासजी को । उन्होंने सच्ची श्रद्धा से रैदासजी के श्रीचरणों में सिर झुकाया था ।

मीरा के साथ भी वही हुआ जैसा भक्तों के साथ अनादि काल से होता आया है । उन्हें तरह-तरह से सताया जाने लगा... संत रैदासजी के बारे में झूठी, घृणित बातें बोलकर उन्हें बहकाने के पुरजोर प्रयास किये जाने लगे ।

लाखों विघ्न-बाधाओं के बीच भी मीराबाई गुरु-ज्ञान का सम्बल ले के प्रभु-प्रेम में मग्न होकर नाचती रहीं, गुनगुनाती रहीं, मुस्कराती रहीं और अपने गुरुदेव के कृपा-प्रसाद को पचाने में सफल हो गयीं ।

मीराबाई का जीवन-चरित्र हमें ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर दृढ़ता के साथ चलने की प्रेरणा देता है और मीराबाई की माँ और दादा का व्यवहार हम अपने बच्चों को किस प्रकार भगवद्भक्ति के सुसंस्कारों से रँगें, इस बात की सच्ची, सुहानी सीख देता है ।

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