ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या

ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या

        सद्गुरू आपसे कह रहे हैं कि आप स्वयं को जो शरीर समझ रहे हो, वास्तव में आप वह नहीं हो । आप मरनेवाले शरीर नहीं अपितु अमर आत्मा हो ।

        शरीर न सत् है, न सुन्दर है और न प्रेमरूप है । यह तो हड्डी-मांस, रूधिर और वात-पित्त-कफ से बना हुआ एक जड़ ढाँचा है । यह शरीर पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं (मृत्यु) की तरफ जा रहा है । परन्तु आप तो पहले भी थे, अभी भी हो और बाद में भी रहोगे । अपने को सदैव सच्चिदानंदस्वरूप मानो ।

         शरीर और इन्द्रियों से व्यवहार करते हुए भी यदि स्वयं को सबका साक्षी, दृष्टा मानोगे तो बेड़ा पार हो जायेगा । वास्तव में आप दृष्टा ही हो । आपकी सत्ता से ही वृत्ति पदार्थों का ज्ञान कराती है । सबकुछ आपकी सत्ता से बना है । मैं आपको आत्मज्ञान की ऊँची बातें बता रहा हूँ । ये बातें इतनी आसानी से समझ नहीं आतीं, अतः आपसे यही कहता हूँ कि सच्चे संतों के संग में रहकर सत्शास्त्रों का अध्ययन करते रहो, सत्य का रहस्य समझ में आयेगा । मुमुक्षु को सदैव एक ही इच्छा रखनी चाहिए कि : ‘मैं अवश्य ही मोक्ष-प्राप्ति करूँगा ।’ आपके भीतर आनंद की धारा बह रही है । उसमें स्नान करो, उसीमें डूबे रहो तो संसार आपको नहीं डुबो पायेगा ।

         ‘आत्मा सत् और जगत मिथ्या है’ – यही सब ग्रंथों एवं सभी साधनाओं का सार है । मन को आत्मा में शांत करने का प्रयत्न करना चाहिए । आत्मा को जानने के बाद कोई इच्छा नहीं बचती । उसे जाननेवाला आत्मस्वरूप हो जाता है, आनंदस्वरूप हो जाता है । उसके लिए समस्त विश्व अपना ही स्वरूप हो जाता है । संसार मेला है, स्वप्न है । आप एक ही सत्य हो । जो कुछ देख रहे हो वह स्वप्न है । आप सबके दृष्टा हो । शरीर, इन्द्रियाँ और उनके दुःख-सुख सबसे परे हो । जब तक शरीर है तब तक परिस्थितियाँ और दुःख-सुख आते रहेंगे परन्तु न दुःख रहेगा और न सुख । जिस प्रकार संसार में आसक्त व्यक्ति संसार के पदार्थों से प्रीति आप आत्मा-परमात्मा से करो और इसी जन्म में जीवनमुक्त हो जाओ...आनंदमय हो जाओ । 

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