Omkar-Gunjan

ॐ कार का अर्थ एवं महत्व

= अ+उ+म+(ँ) अर्ध तन्मात्रा । ॐ का अ कार स्थूल जगत का आधार है । उ कार सूक्ष्म जगत का आधार है । म कार कारण जगत का आधार है । अर्ध तन्मात्रा (ँ) जो इन तीनों जगत से प्रभावित नहीं होता बल्कि तीनों जगत जिससे सत्ता-स्फूर्ति लेते हैं फिर भी जिसमें तिलभर भी फर्क नहीं पड़ता, उस परमात्मा का द्योतक है ।
आत्मिक बल देता है । ॐ के उच्चारण से जीवनशक्ति उर्ध्वगामी होती है । इसके सात बार के उच्चारण से शरीर के रोग को कीटाणु दूर होने लगते हैं एवं चित्त से हताशा-निराशा भी दूर होतीहै । यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने सभी मंत्रों के आगे ॐ जोड़ा है । शास्त्रों में भी ॐ की बड़ी भारी महिमा गायी गयी है ।
सारे शास्त्र-स्मृतियों का मूल है वेद । वेदों का मूल गायत्री है और गायत्री का मूल है ओंकार । ओंकार से गायत्री, गायत्री से वैदिक ज्ञान, और उससे शास्त्र और सामाजिक प्रवृत्तियों की खोज हुई ।
सब मंत्रों में ॐ राजा है । ओंकार अनहद नाद है । यह सहज में स्फुरित हो जाता है । अकार, उकार, मकार और अर्धतन्मात्रायुक्त ॐ एक ऐसा अदभुत भगवन्नाम मंत्र है कि इस पर कई व्याखयाएँ हुई । कई ग्रंथ लिखे गये । फिर भी इसकी महिमा हमने लिखी ऐसा दावा किसी ने किया । इस ओंकार के विषय में ज्ञानेश्वरी गीता में ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा हैः
ॐ नमो जी आद्या वेदप्रतिपाद्या जय जय स्वसंवेद्या आत्मरूपा ।
परमात्मा का ओंकारस्वरूप से अभिवादन करके ज्ञानेश्वर महाराज ने ज्ञानेश्वरी गीता का प्रारम्भ किया ।
धन्वंतरी महाराज लिखते हैं कि ॐ सबसे उत्कृष्ट मंत्र है ।
वेदव्यासजी महाराज कहते हैं कि प्रणवः मंत्राणां सेतुः ।यह प्रणव मंत्र सारे मंत्रों का सेतु है ।
पतंजलि महाराज ने कहा हैः तस्य वाचकः प्रणवः । ॐ (प्रणव) परमात्मा का वाचक है, उसकी स्वाभाविक ध्वनि है ।
ॐ के रहस्य को जानने के लिए कुछ प्रयोग करने के बाद रूस के वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित हो उठे । उन्होंने प्रयोग करके देखा कि जब व्यक्ति बाहर एक शब्द बोले एवं अपने भीतर दूसरे शब्द का विचार करे तब उनकी सूक्ष्म मशीन में दोनों शब्द अंकित हो जाते थे । उदाहरणार्थ, बाहर के क कहा गया हो एवं भीतर से विचार ग का किया गया हो तो क और ग दोनों छप जाते थे । यदि बाहर कोई शब्द न बोले, केवल भीतर विचार करे तो विचारा गया शब्द भी अंकित हो जाता था ।
किन्तु एकमात्र ॐ ही ऐसा शब्द था कि व्यक्ति केवल बाहर से ॐ बोले और अंदर दूसरा कोई भी शब्द विचारे फिर भी दोनों ओर का ॐ ही अंकित होता था । अथवा अंदर ॐ का विचार करे और बाहर कुछ भी बोले तब भी अंदर-बाहर का ॐ ही छपता था ।
समस्त नामों में ॐ का प्रथम स्थान है ।
रोज रात्रि में तुम 10 मिनट ओंकार का जप करके सो जाओ । फिर देखो, इस मंत्र भगवान की क्या-क्या करामात होती है? और दिनों की अपेक्षा वह रात कैसी जाती है और सुबह कैसी जाती है? पहले ही दिन फर्क पड़ने लग जायेगा ।
मंत्र के ऋषि, देवता, छंद, बीज और कीलक होते हैं । इस विधि को जानकर गुरुमंत्र देने वाले सदगुरु मिल जायें और उसका पालन करने वाला सतशिष्य मिल जाये तो काम बन जाता है । ओंकार मंत्र का छंद गायत्री है, इसके देवता परमात्मा स्वयं  है और मंत्र के ऋषि भी ईश्वर ही हैं ।

ओंकार की दिव्य शक्तियाँ

 

भगवान की रक्षण शक्ति, गति शक्ति, कांति शक्ति, प्रीति शक्ति, अवगम शक्ति, प्रवेश अवति शक्ति आदि 19 शक्तियाँ ओंकार में हैं । इसका आदर से श्रवण करने से मंत्रजापक को बहुत लाभ होता है ऐसा संस्कृत के जानकार पाणिनी मुनि ने बताया है ।
14 साल तक वे पहली कक्षा से दूसरी में नहीं जा पाये थे । फिर उन्होंने शिवजी की उपासना की, उनका ध्यान किया तथा शिवमंत्र जपा । शिवजी के दर्शन किये व उनकी कृपा से संस्कृत व्याकरण की रचना की और अभी पाणिनी मुनि का संस्कृत व्याकरण पढ़ाया जाता है । 
मंत्र में 19 शक्तियाँ हैं-
रक्षण शक्तिः ॐ सहित मंत्र का जप करते हैं तो वह हमारे जप तथा पुण्य की रक्षा करता है । किसी नामदान के लिए हुए साधक पर यदि कोई आपदा आनेवाली है, कोई दुर्घटना घटने वाली है तो मंत्र भगवान उस आपदा को शूली में से काँटा कर देते हैं । साधक का बचाव कर देते हैं । ये अनुभूतियाँ समर्थ भगवान की सामर्थ्यता प्रकट करती हैं ।
गति शक्तिः जिस योग में, ज्ञान में, ध्यान में आप फिसल गये थे, उदासीन हो गये थे, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे उसमें मंत्रदीक्षा लेने के बाद गति आने लगती है । मंत्रदीक्षा के बाद आपके अंदर गति शक्ति कार्य में आपको मदद करने लगती है ।
कांति शक्तिः मंत्रजाप से जापक के कुकर्मों के संस्कार नष्ट होने लगते हैं और उसका चित्त उज्जवल होने लगता है । उसकी आभा उज्जवल होने लगती है, उसकी मति-गति उज्जवल होने लगती है और उसके व्यवहार में उज्जवलता आने लगती है ।
मंत्र लेकर ज्यों-ज्यों आप श्रद्धा से, एकाग्रता से और पवित्रता से जप करते जायेंगे त्यों-त्यों विशेष लाभ होता जायेगा ।
प्रीति शक्तिः ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों मंत्र के देवता के प्रति, मंत्र के ऋषि, मंत्र के सामर्थ्य के प्रति आपकी प्रीति बढ़ती जायेगी ।
तृप्ति शक्तिः ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों आपकी अंतरात्मा में तृप्ति बढ़ती जायेगी, संतोष बढ़ता जायेगा । जिन्होंने नियम लिया है और जिस दिन वे मंत्र नहीं जपते, उनका वह दिन कुछ ऐसा ही जाता है । जिस दिन वे मंत्र जपते हैं, उस दिन उन्हें अच्छी तृप्ति और संतोष होता है ।
अवगम शक्तिः मंत्रजाप से दूसरों के मनोभावों को जानने की शक्ति विकसित हो जाती है । दूसरे के मनोभावों को आप अंतर्यामी बनकर जान सकते हो । वास्तव में यह भगवत्शक्ति के विकास की बात है ।
प्रवेश अवति शक्त अर्थात् सबके अंतरतम की चेतना के साथ एकाकार होने की शक्ति । अंतःकरण के सर्व भावों को तथा पूर्वजीवन के भावों को और भविष्य की यात्रा के भावों को जानने की शक्ति कई योगियों में होती है ।
श्रवण शक्तिः मंत्रजाप के प्रभाव से जापक सूक्ष्मतम, गुप्ततम शब्दों का श्रोता बन जाता है । जैसे, शुकदेवजी महाराज ने जब परीक्षित के लिए सत्संग शुरु किया तो देवता आये । शुकदेवजी ने उन देवताओं से बात की । माँ आनंदमयी का भी देवलोक के साथ सीधा सम्बन्ध था । और भी कई संतो का होता है । दूर देश से भक्त पुकारता है कि गुरुजी ! मेरी रक्षा करो... तो गुरुदेव तक उसकी पुकार पहुँच जाती है !
स्वाम्यर्थ शक्तिः अर्थात् नियामक और शासन का सामर्थ्य । नियामक और शासक शक्ति का सामर्थ्य विकसित करता है प्रणव का जाप ।
याचन शक्तिः अर्थात् याचना की लक्ष्यपूर्ति का सामर्थ्य देनेवाला मंत्र ।
क्रिया शक्तिः अर्थात् निरन्तर क्रियारत रहने की क्षमता, क्रियारत रहनेवाली चेतना का विकास ।
इच्छित अवति शक्तिः अर्थात् वह ॐ स्वरूप परब्रह्म परमात्मा स्वयं तो निष्काम है किंतु उसका जप करने वाले में सामने वाले व्यक्ति का मनोरथ पूरा करने का सामर्थ्य आ जाता है । इसीलिए संतों के चरणों में लोग मत्था टेकते हैं, कतार लगाते हैं, प्रसाद धरते हैं, आशीर्वाद माँगते हैं आदि आदि । इच्छित अवन्ति शक्ति अर्थात् निष्काम परमात्मा स्वयं शुभेच्छा का प्रकाशक बन जाता है ।
दीप्ति शक्तिः अर्थात् ओंकार जपने वाले के हृदय में ज्ञान का प्रकाश बढ़ जायेगा । उसकी दीप्ति शक्ति विकसित हो जायेगी ।
वाप्ति शक्तिः अणु-अणु में जो चेतना व्याप रही है उस चैतन्यस्वरूप ब्रह्म के साथ आपकी एकाकारता हो जायेगी ।
आलिंगन शक्तिः अर्थात् अपनापन विकसित करने की शक्ति । ओंकार के जप से पराये भी अपने होने लगेंगे तो अपनों की तो बात ही क्या? जिनके पास जप-तप की कमाई नहीं है उनको तो घरवाले भी अपना नहीं मानते, किंतु जिनके पास ओंकार के जप की कमाई है उनको घरवाले, समाजवाले, गाँववाले, नगरवाले, राज्य वाले, राष्ट्रवाले तो क्या विश्ववाले भी अपना मानकर आनंद लेने से इनकार नहीं करते । 
हिंसा शक्तिः ओंकार का जप करने वाला हिंसक बन जायेगा? हाँ, हिँसक बन जायेगा किंतु कैसा हिंसक बनेगा? दुष्ट विचारों का दमन करने वाला बन जायेगा और दुष्टवृत्ति के लोगों के दबाव में नहीं आयेगा । अर्थात् उसके अन्दर अज्ञान को और दुष्ट सरकारों को मार भगाने का प्रभाव विकसित हो जायेगा ।
दान शक्तिः अर्थात् वह पुष्टि और वृद्धि का दाता बन जायेगा । फिर वह माँगनेवाला नहीं रहेगा, देने की शक्तिवाला बन जायेगा । फिर वह माँगने वाला नहीं रहेगा, देने की शक्तिवाला बन जायेगा । वह देवी-देवता से, भगवान से माँगेगा नहीं, स्वयं देने लगेगा ।
भोग शक्तिः प्रलयकाल स्थूल जगत को अपने में लीन करता है, ऐसे ही तमाम दुःखों को, चिंताओं को, भयों को अपने में लीन करने का सामर्थ्य होता है प्रणव का जप करने वालों में । उसके लिए तो नित्य नवीन रस, नित्य नवीन आनंद, नित्य नवीन मौज रहती है ।
वृद्धि शक्तिः अर्थात् प्रकृतिवर्धक, संरक्षक शक्ति । ओंकार का जप करने वाले में प्रकृतिवर्धक और सरंक्षक सामर्थ्य आ जाता है ।