शारदीय नवरात्रि महत्व
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शारदीय नवरात्रि महत्व

शारदीय नवरात्र

आश्विन शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि का पर्व शारदीय नवरात्र के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत उपवास , आद्यशक्ति माँ जगदम्बा के पूजा,अर्चना,जप ध्यान का पर्व है।

देवी भागवत में आता है कि विद्या, धन, एवं पुत्र के अभिलाषी को नवरात्र व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। जिसका राज्य छीन गया हो , ऐसे नरेश को पुन : गद्दी पर बिठाने की क्षमता भी इस व्रत में है। नवरात्र में प्रतिदिन देवी-पूजन, हवन व कुमारी पूजन करें तथा ब्राह्मण को भोजन करायें तो नवरात्र- व्रत पूरा होता है ऐसी उक्ति है।

नवरात्र के दिनों में भजन कीर्तन गा कर, वाद्य बजा कर और नाचकर बड़े समारोह के साथ उत्सव मनाना चहिए। भूमि पर शयन एवं यथाशक्ति कन्याओं को भोजन कराना चाहिए किन्तु एक वर्ष व उससे कम उम्र की कन्या नहीं लेनी चाहिए। २ से १० वर्ष तक की कन्या को ही लिया जा सकता है।

देवी भागवत में कहा गया है कि दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाली भगवती भद्रकाली का अवतार अष्टमी तिथि को हुआ था। मनुष्य यदि नवरात्र में प्रतिदिन पूजन करने में असमर्थ हो तो अष्टमी के दिन विशेष रूप से पूजन करना चाहिए।

यदि कोई नवरात्र के उपवास न कर सकता हो तो सप्तमी,अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह सम्पूर्ण नवरात्र के उपवास के फल को प्राप्त कर सकता है।

नवरात्र पर जागरण

नवरात्र पर उत्तम जागरण वह है, जिसमें-

1) शास्त्र-अनुसार चर्चा हो ।

2) भक्तिभाव से युक्त माँ का कीर्तन हो।

3) वाद्य , ताल आदि से युक्त सात्विक संगीत हो ।

4) सात्विक नृत्य हो , ऐसा नहीं कि डिस्को या अन्य कोई पाश्चात्य नृत्य किया ।

5) माँ जगदम्बा पर नजर हो , ऐसा नहीं कि किसी को गन्दी नजर से देखा।

6) मनोरंजन भी सात्विक हो।

 

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