साधना हेतु अमृतकाल : चतुर्मास
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साधना हेतु अमृतकाल : चतुर्मास

१२ जुलाई से ८ नवम्बर २०१९ तक 

   चतुर्मास विशेष 


चतुर्मास के चार महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए यह काल साधकों, भक्तों, उपासकों के लिए सुवर्णकाल माना गया है । इस काल में जो कोई व्रत, नियम पाला जाता है वह अक्षय फल देता है, इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को यत्नपूर्वक चतुर्मास में कोई नियम अवश्य लेना चाहिए । श्रीहरि की आराधना के लिए यह पवित्र समय है । इन दिनों में शादी-विवाह, सकाम कर्म वर्जित हैं ।

चतुर्मास में जरूर करें ये, होगा विशेष लाभ 

१. जलाशयों में स्नान करना । तिल और जौ को पीसकर रख दिया । थोड़ा तिल-जौ मिलाकर बाल्टी में बेलपत्र डाल सको तो डालो उसका स्नान करने से पापनाशक, प्रसन्नतादायक स्नान होगा । तन-मन के दोष मिटने लगेंगे । अगर 'ॐ नमः शिवाय' ५ बार मन में जप करके फिर लोटा सिर पे डाला पानी का, तो पित्त की बीमारी, कंठ का सूखना, चिड़चिड़ा स्वभाव भी कम हो जायेगा । भगवान नारायण शेष शैय्या पर शयन करते हैं इसलिए ४ महीने सभी जलाशयों में तीर्थत्व का प्रभाव आ जाता है ।

२. गद्दे-वद्दे हटाकर सादे बिस्तर पर शयन करें । संत-दर्शन,  सत्शास्त्र-पठन, सत्संग-श्रवण, संतों की सेवा -  यह चतुर्मास में महापुण्यदायी है ।

३. स्टील के बर्तन में भोजन करने की अपेक्षा पलाश के पत्तों ( जिन पर प्लास्टिक नहीं लगा हो ) पर भोजन करें तो वो भोजन पापनाशक व पुण्यप्रद होता है, ब्रह्मभाव को प्राप्त कराने वाला होता है ।


४. चतुर्मास के ४ महीनों में दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत करना चाहिये। १५ दिन में १ दिन उपवास १४ दिन का खाया हुआ जो अन्न है वो ओज में बदल जायेगा । ओज-तेज, बुद्धि को और बलवान बनायेगा ।


५. चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे पुरुष-सूक्त का पाठ करने वाले की बुद्धि का विकास होता है और सुबह या जब समय मिले भ्रूमध्य में ओंकार का ध्यान करने से भी बुद्धि का विकास होता है ।

६. दान, दया और इन्द्रिय संयम - ये उत्तम धर्म करने वाले को उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है ।

७. आंवला-मिश्रीयुक्त जल से स्नान महान पुण्य प्रदान करता है ।

               क्या न करें चतुर्मास में 

१. इन ४ महीनों में पराया धन हड़प करना, परस्त्री से समागम करना, निंदा करना, ब्रह्मचर्य तोड़ना तो मानो हाथ में आया हुआ अमृत कलश ढोल दिया । निंदा न करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें, परधन-परस्त्री पर बुरी नजर न करें ।

२. ताम्बे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिये, पानी नहीं पीना चाहिये ।


३. चतुर्मास में काला और नीला वस्त्र पहनने से स्वास्थ्य-हानि और पुण्यनाश होता है ।

४. शास्त्र वचन है :- "परनिंदा महा पापं परनिंदा महा भयं परनिंदा महा दुखं तस्या पातकम न परम" 

ये स्कन्द पुराण का श्लोक है । परनिंदा महापाप है, परनिंदा महा भय है, परनिंदा महा दुःख है, उस से बड़ा कोई पाप नहीं । इस चतुर्मास में पक्का व्रत ले लो कि हम किसी की निंदा नहीं करेंगे ।

५. असत्य भाषण का, क्रोध का त्याग कर दें ।

६. बाजारू चीजें -  आइसक्रीम, पेप्सी, कोका-कोला, शहद आदि चीजों का त्याग कर दें । 

७. चतुर्मास में स्त्री-पुरुष के मैथुन-संग का त्याग कर दें ।

जो मनुष्य जप, नियम, व्रत आदि के बिना ही चतुर्मास व्यतीत करता है वह मूर्ख है और जो इन साधनों द्वारा इस अमूल्य काल का लाभ उठाता है वह मानो अमृतकुम्भ ही पा लेता है । भारतीय संस्कृति की यह कितनी सुंदर व्यवस्था है कि विभिन्न ऋतुओं, मासों में विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा जीव को अपने भौतिक कल्याण के साथ-साथ आध्यात्मिक कल्याण का सुअवसर भी प्राप्त हो जाता है । 


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