Yoga Asana
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Yoga Asana

योगासन

परिचय

योगासन विभिन्न शारीरिक क्रियाओं और मुद्राओं के माध्यम से तन को स्वस्थ, मन को प्रसन्न एवं सुषुप्त शक्तियों को जागृत करने हेतु हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों द्वारा खोजी गयी एक दिव्य प्रणाली है।

कुछ विशेष बातें

स्थानः आसनों का अभ्यास स्वच्छ, हवादार कमरे में करना चाहिए। बाहर खुले वातावरण में भी अभ्यास कर सकते हैं परंतु आसपास का वातावरण शुद्ध होना चाहिए।

समयः प्रातःकाल खाली पेट आसन करना अति उत्तम है। भोजन के छः घंटे बाद व दूध पीने के दो घंटे बाद भी आसन कर सकते हैं।

आवश्यक साधनः गर्म कम्बल, चटाई अथवा टाट आदि को बिछाकर ही आसन करें।

स्वच्छताः शौच और स्नान से निवृत्त होकर आसन करें तो अच्छा है।

ध्यान दें- श्वास मुँह से न लेकर नाक से ही लेना चाहिए। आसन करते समय शरीर के साथ जबरदस्ती न करें। धैर्यपूर्वक अभ्यास बढ़ाते जायें।

टिप्पणीः 8 वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों को कोई भी आसन या प्राणायाम नहीं करना चाहिए। 5 से 8 वर्ष के बच्चे व्यायाम कर सकते हैं।

हलासनः

विधिः स्थिति क्रम। सीधे लेट जायें, श्वास लेकर भीतर रोकें। अब दोनों पैरों को एक साथ धीरे-धीरे ऊपर ले जायें। पैर बिल्कुल सीधे, तने हुए रखकर पीछे सिर की तरफ झुकायें व पंजे जमीन पर लगायें। ठोढ़ी छाती से लगी रहे। फिर सामान्य श्वास-प्रश्वास करें। श्वास लेकर रोकें व धीरे-धीरे मूल स्थिति में आ जायें।

समयः एक से तीन मिनट।

लाभः युवावस्था जैसी स्फूर्ति बनाये रखने वाला व पेट की चर्बी कम करने वाला यह अदभुत आसन है। इस आसन के नियमित अभ्यास से शरीर बलवान व तेजस्वी बनता है और रक्त की शुद्धि होती है।

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धनुरासन

विधिः स्थिति क्रम। पेट के बल उलटे होकर लेट जायें। अब दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ें। दोनों हाथों से दोनों पैरों को टखनों से पकड़ें। अब श्वास छोड़ें और हाथ से पकड़े हुए पैरों को कसकर धीरे-धीरे खींचे। जितना हो सके उतना सिर को पीछे की ओर ले जाने की कोशिश करें। दृष्टि भी ऊपर एवं पीछे की ओर रहनी चाहिए। श्वास रोके हुए इस स्थिति में टिके रहें। अब हाथ खोलकर पैर तथा सिर को मूल अवस्था में ले जायें और श्वास ले लें। तीन-चार बार यह आसन करना चाहिए।

समयः प्रारम्भ में पाँच सैकेंड। धीरे-धीरे समय बढ़ाकर तीन मिनट या उससे भी अधिक समय इस आसन का अभ्यास करें।

लाभः धनुरासन के अभ्यास से पेट के रोग नष्ट होते हैं। कब्ज में लाभ होता है। भूख खुलती है। आवाज मधुर बनती है। मुखाकृति सुंदर बनती है। आँखों की रोशनी बढ़ती है। शरीर का सौंदर्य बढ़ता है। पाचनशक्ति बढ़ती है।

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पादपश्चिमोत्तानासन

विधिः स्थिति क्रम। बैठकर दोनों पैरों को सामने लम्बा फैला दें। श्वास भीतर भरते हुए दोनों हाथों को ऊपर की ओर लम्बा करें। श्वास रोके हुए दाहिने हाथ की तर्जनी और अँगूठे से दाहिने पैर का अँगूठा और बायें हाथ की तर्जनी और अँगूठे से  बायें पैर का अँगूठा पकड़ें। श्वास छोड़ते हुए नीचे झुकें और सिर को दोनों घुटनों के मध्य में रखें। ललाट घुटनों को स्पर्श करे और घुटने जमीन से लगे रहें। हाथ की दोनों कोहनियाँ घुटनों के पास जमीन से लगी रहें। सामान्य श्वास-प्रश्वास करते हुए इस स्थिति में यथाशक्ति पड़े रहें। धीरे-धीरे श्वास भीतर भरते हुए मूल स्थिति में आ जायें।

समयः प्रारम्भ में आधा मिनट इस आसन को करते हुए धीरे-धीरे 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं।

ध्यान दें- आप अवश्य इस आसन का लाभ लेना। प्रारम्भ के चार पाँच दिन जरा कठिन लगेगा लेकिन थोड़े दिनों के नियमित अभ्यास के पश्चात आप सहजता से यह आसन कर सकेंगे। यह निश्चित ही स्वास्थ्य का साम्राज्य स्थापित कर देगा।

लाभः चिंता एवं उत्तेजना शांत करने के लिए यह आसन उत्तम है। इस आसन से उदर, छाती और मेरूदंड की कार्यक्षमता बढ़ती है। संधिस्थान मजबूत बनते हैं और जठराग्नि प्रदीप्त होती है। पेट के कीड़े अनायास ही मर जाते हैं।

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सर्वांगासन

विधिः स्थिति क्रम। बिछे हुए आसन पर लेट जायें। श्वास लेकर भीतर रोकें व कमर से दोनों पैरों तक का भाग ऊपर उठायें। दोनों हाथों से कमर को आधार देते हुए पीठ का भाग भी ऊपर उठायें। अब सामान्य श्वास-प्रश्वास करें। हाथ की कोहनियाँ भूमि से लगी रहें व ठोढ़ी छाती के साथ चिपकी रहे। गर्दन और कंधे के बल पूरा शरीर ऊपर की ओर सीधा खड़ा कर दें। दृष्टि पैर के दोनों अँगूठों पर हो। गहरा श्वास लें, फिर श्वास बाहर निकाल दें। श्वास बाहर रोककर गुदा व नाभि के स्थान को अंदर सिकोड़ लें व ʹअर्यमायै नमः।ʹ मंत्र का मानसिक जप करें। अब गुदा को पूर्व स्थिति में ले आयें। फिर से ऐसा करें, 3 से 5 बार ऐसा करने के बाद गहरा श्वास लें। श्वास भीतर भरते हुए ऐसा भाव करें कि ʹमेरी ऊर्जाशक्ति ऊर्ध्वगामी होकर सहस्रार चक्र की ओर प्रवाहित हो रही है। मेरे जीवन में संयम बढ़ रहा है।ʹ फिर श्वास बाहर छोड़ते हुए उपर्युक्त विधि को दोहरायें। ऐसा 5 बार कर सकते हैं।

समयः सामान्यतः एक से पाँच मिनट तक यह आसन करें। धीरे-धीरे 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं।

लाभः यह आसन मेधाशक्ति को बढ़ाने वाला व चिरयौवन की प्राप्ति कराने वाला है। विद्यार्थियों को तथा मानसिक, बौद्धिक कार्य करने वाले लोगों को यह आसन अवश्य करना चाहिए। इससे नेत्रों और मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है। इस आसन को करने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है व स्वप्नदोष जैसे रोगों का नाश होता है। सर्वांगासन के नित्य अभ्यास से जठराग्नि तीव्र होती है, त्वचा लटकती नहीं तथा झुर्रियाँ नहीं पड़तीं।

सावधानीः थायराइड के अति विकासवाले, उच्च रक्तचाप वाले, खूब कमजोर हृदयवाले और अत्यधिक चर्बी वाले लोग यह आसन न करें।

ʹआलस्यरहित, अकुटिल और घोर परिश्रमी जन सफल होते हैं। (ऋग्वेदः 4.4.12)

सत्य बोलने से बुद्धि विलक्षण लक्ष्णों से सम्पन्न होती है।

आत्मशांति के आगे विश्व के किसी भी वैभव का मूल्य नहीं है।

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