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सूर्य चिकित्सा
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सूर्य चिकित्सा

 यह सम्पूर्ण जगत सूर्य के आश्रय पर ही स्थित है । सूर्य के अभाव में पार्थिव जगत नहीं रह सकता । सभी मनुष्यों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों का जीवन सूर्य पर ही अवलम्बित है । संसार का संपूर्ण भौतिक विकास भी सूर्य की सत्ता पर निर्भर है ।

सूर्य के प्रकाश में जो रंगीन तरंगें प्रवाहित होती है, वे मनुष्य और पशु-पक्षियों के लिए महत्त्वपूर्ण पोषण प्रदान करती हैं । वृक्ष-वनस्पतियों को जमीन से मिलनेवाला खाद-पानी जितना आवश्यक है उससे कहीं अधिक आवश्यकता धूप की है । सूर्य की किरणें मिट्टी के हानिकारक विषाणुओं को नष्ट करके भूमि की उर्वरा-शक्ति को बढ़ाती हैं । बीजों, फलों, अनाजों और शाकों के ऊपरी छिलके में महत्त्वपूर्ण खनिज, क्षार, विटामिन और प्रोटीन पाये जाते हैं, यह अनुदान उन्हें सीधे सूर्य-किरणों के संपर्क से मिलता है । छिलके में थोड़ा कड़ापन और कसैलापन देखकर लोग उसे फेंक देते हैं, आटे को छानकर भूसी फेंक देते हैं और शाक-भाजियों एवं दालों के छिलके उतार देते हैं जबकि इसी भाग में अधिक पौष्टिकता रहती है ।        

                                                                                                                                                            सूर्य-किरणों में रोगों को नष्ट करने तथा प्राणीमात्र को स्वास्थ्य एवं नवजीवन प्रदान करने की अद्भुत क्षमता है । इस स्थिति में मकानों का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए, जहाँ धूप और खुली हवा का आवागमन हो सके । जिन कमरों में सूर्य की किरणें पहुँचती हैं, वे घोर शीतकाल में भी रात्रि को गर्म रहते हैं । उनमें शयन करना स्वास्थ्यप्रद है । धुले हुए कपड़ों को तेज धूप में ही सुखाना चाहिए । । सूर्य के प्रकाश, धूप तथा किरणों का सेवन प्रत्येक ऋतु में आवश्यक है ।

       सर्दियों में शीत-निवारण के लिए धूप सेंकने से अच्छा और उपयुक्त उपाय दूसरा नहीं है । तीक्ष्ण किरणों से कोमल मस्तिष्क को बचाए रखने के लिए सिर को कपड़े आदि से ढ़ककर रखना आवश्यक है । दिन के चढ़ते तथा ढलते समय की सहज ऊर्जा शरीर पर पड़ते रहना आवश्यक तथा हितकर है । रोगियों की चिकित्सा और परिचर्या में यह स्मरण रखने योग्य है कि उनके शरीर के सभी भागों तक धूप पहुँचाने की व्यवस्था की जाय । इसके लिए प्रातःकाल की धूप तब तक सर्वोत्तम मानी जाती है, जब तक कि वह असह्य न हो जाय । जो रोगी चल-फिर सकते हों वे धूप में टहलें । अन्यथा चारपाई पर पड़े हुए ही रोगी को चादर ओढ़कर धूप-सेवन करने की दैवी-चिकित्सा का लाभ तो उठाना ही चाहिए ।

       सर्दियों के दिनों में यदि धूप में गर्म किये गये पानी से स्नान किया जा सके तो वह साधारण या गीजर के जल की अपेक्षा कहीं अधिक स्फूर्तिदायक एवं रोगनाशक सिद्ध होता है । सूर्य-किरणों से इतनी शक्ति उपलब्ध की जाती है और की जा सकती है जो किसी भी पौष्टिक आहार की अपेक्षा अधिक बलवर्धक सिद्ध हो और किसी भी कीटाणुनाशक औषधि की तुलना में रोगों को निवारण में अधिक उपयोगी सिद्ध हो । भारतीय ऋषि इस रहस्यमयी क्षमता को प्राणतत्त्व कहकर पुकारते हैं जो कि शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक प्रगति का आधार है । सूर्योदय के पूर्व ही नहा-धोकर उगते सूर्य को जल चढ़ाने का विशेष महत्त्व है ।

       प्रातःकाल के निकलते सूर्य की प्रथम किरणें स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभप्रद है । इस समय सूर्यनमस्कार, आसन, व्यायाम का अपना अलग ही महत्त्व है । सूर्योपासना, सूर्य की प्रार्थना एवं उनके ध्यान से बुद्धि का परिमार्जन होकर सद्विवेक जाग्रत होता है और मनुष्य पापकर्मों से सहज ही बच जाता है ।

       सर्दियों के दिनों में सुबह दस बजे के पहले और गर्मी में आठ बजे के पहले धूपस्नान भी किया जा सकता है । कोमल सूर्य-किरणों से विटामिन ‘डी’ प्राप्त होता है । सरसों का तेल यदि धूप में रखकर गर्म कर लें और फिर धूप में मालिश करें तो सोने पे सुहागा । इसलिए माताएँ शिशुओं को धूप में लिटाकर मालिश करती हैं ।

       चर्म रोगों में जैसे – दाद, खाज, खुजली तथा स्नायु-दुर्बलता में धूप बहुत लाभ करती है । अस्थिक्षय में यह रामबाण है । फेफड़े के क्षय में रोगी को सीधी धूप नहीं लेनी चाहिए । जिन्हें तेज बीमारी हो या नकसीर आता हो उन्हें सीधी धूप नहीं लेनी चाहिए । स्नान के तुरंत बाद धूप न लें । दस-पन्द्रह मिनट गुजर जाने दें । भरपेट भोजन के पश्चात् कड़ी धूप में जाना वर्जित है ।

       यदि प्रतिदिन प्रातः व सायं धूप का सेवन किया जाय तो अस्वस्थता की दयनीय दुर्दशा से बचा जा सकता है । रक्त का पीलापन, पतलापन, लौहतत्त्व की कमी और नसों की दुर्बलता आदि में सूर्य की किरणें लाभकारी हैं। 

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