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हस्त-चिकित्सा
हस्त-चिकित्सा
  • शरीर के किसी भी अंग की पीड़ा में चमत्कारिक, पीड़ानिवारक, स्वास्थ्यएवं सौन्दर्यवर्धक स्पर्श-चिकित्सा कारगर है ।
  • मानसिक पवित्रता और एकाग्रता के साथ मन में निम्नलिखित वेदमंत्र का पाठ करते हुए दोनों हथेलियों को गर्म होने तक परस्पर रगड़ें और फिर उनसे पीड़ित अंग का बार-बार सेंक करें । ऐसा 5 मिनट तक करें । सेक करने के पश्चात् नेत्र बन्द करके कुछ मिनट तक सो जाइये ।
  • इससे गठिया, सिर दर्द तथा अन्य सब प्रकार के दर्द दूर होते हैं ।
  •  मंत्र इस प्रकार हैः

अयं मे हस्तो भगवान् अयं मे भगवत्तरः ।

अयं मे विश्वभेषजोSयं शिवाभिमर्शन । ।

  •  'मेरी प्रत्येक हथेली भगवान (ऐश्वर्यशाली) है, अच्छा असर करने वाली है । अधिकाधिक ऐश्वर्य और अत्यंत बरकत वाली है । मेरे हाथ में विश्व के सभी रोगों की समस्त औषधियाँ हैं और मेरे हाथ का स्पर्श कल्याणकारी, सर्व रोगनिवारक और सर्वसौन्दर्य-सम्पादक है ।'
  • आपकी मानसिक पवित्रता तथा एकाग्रता जितनी अधिक होगी उसी अनुपात में आप इस मंत्र द्वारा हस्त चिकित्सा में सफल होते चले जायेंगे ।
  • अपनी हथेलियों के इस प्रकार एकाग्र और पवित्र प्रयोग से आप न केवल अपने ही अपितु अन्य किसी के रोग भी दूर कर सकते हैं ।

 

हथेलियों में सर्वरोगनिवारक और सौन्दर्यवर्धक शक्ति

  • रात्रि में सोते समय बिस्तर पर लेटकर और प्रातः बिस्तर से उठने से पूर्व इसी मंत्र को बोलते हुए दोनों हथेलियों को परस्पर रगड़कर गर्म करके उनसे सिर से लेकर पाँव के तलवों तक क्रमशः सिर, बाल, ललाट, नेत्र, नाक, कान, होंठ, गाल, ठोड़ी, गर्दन, कन्धे, भुजाएँ, वक्ष, हृदय, पेट, पीठ, नितंब, जंघाएँ, घुटने, पिंडलियाँ, टखने, पाद, पृष्ठों और पैर के तलुओं का स्पर्श बड़े स्नेह और शान्ति से कीजिए । इससे आप देखेंगे कि आपका स्वास्थ्य और सौन्दर्य गुलाब के पुष्प की भाँति सुविकसित होता जा रहा है । हथेलियों को परस्पर रगड़कर मनोयोग के साथ मंत्र सहित सिर से पाँव तक सारे शरीर के स्पर्श द्वारा स्वास्थ्य और सौन्दर्य की वृद्धि होती है ।
  •  यदि आप मंत्र बोलते हुए दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर गर्म करके नेत्रों का स्पर्श करें और अनुभव करें कि 'आपकी पलकों के बाल सुन्दर और आकर्षक होते जा रहे हैं, आपकी दृष्टिशक्ति बढ़ रही है और आपकी दृष्टि स्पष्ट, पवित्र और मनोहर हो रही है....' तो आप कुछ ही दिनों के उपरान्त नेत्रों में वैसा ही आश्चर्य जनक सुधार पायेंगे ।
  • मनुष्य की दोनों हथेलियों में सर्वरोग निवारक औषधियाँ निहित हैं और दोनों हथेलियों को परस्पर रगड़कर गर्म करने से सर्वरोगनिवारक औषधियों का प्रभाव हथेलियों की त्वचा में आ जाता है ।
  • इस प्रकार हथेलियों को परस्पर रगड़कर सिर से पाँव तक शरीर के समस्त अवयवों पर घुमाने से प्रत्येक अवयव के रोग और विकार निकल जाते हैं और उसके स्थान पर आरोग्यता एवं सुन्दरता की प्राप्ति होने लगती है ।
  • यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि देशवासी आचार-विचार की दृष्टि से भ्रष्टाचार की एवं आहार-विहार की दृष्टि से विषाक्त प्रदूषण की चक्की में पिस रहे हैं । जहाँ भ्रष्ट आचरण हमारे चरित्र और स्वभाव को दूषित कर रहा है वहीं दूषित एवं विषाक्त पर्यावरण हमारे शरीर और स्वास्थ्य का नाश कर रहा है ।
  • जल और वायु के साथ अनाज, सब्जी, फल, दूध आदि खाद्य और पेय पदार्थ भी दूषित होते जा रहे हैं जो नाना प्रकार के रोग उत्पन्न कर रहे हैं ।
  • अतः ऐसी स्थिति में लापरवाही न बरतें । सब्जी, फल आदि को अच्छी तरह धोकर प्रयोग करें । पानी दूषित हो तो उबालकर ठण्डा करके सेवन करें । दूध को उबालकर कुनकुना गर्म ही सेवन करें । बाजारू वस्तुएँ, मिठाइयाँ, पेय पदार्थ आदि का प्रयोग भी आपके शरीर को दूषित कर सकता है यह न भूलें । अपने शरीर को स्वस्थ और रोगप्रतिरोधक शक्ति से भरपूर रखें जिससे कि वह इस प्रदूषण का मुकाबला कर सके । इसके लिए उचित आहार-विहार और श्रेष्ठ आचार-विचार का पालन करना अनिवार्य है । भावप्रकाश (पूर्वखण्ड) में आता हैः

    दिनचर्या निशाचर्यामृतचर्यां यथोदिताम् ।

    आचारन्पुरुषः स्वस्थः सदातिष्ठति नान्यथा ।।

  • दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या जिस प्रकार से आयुर्वेद ने बतायी है उसी प्रकार से आचरण करने वाला मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है । इसके विपरीत आचरण करने वाला स्वस्थ नहीं रह सकता ।

 

 

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