जानिए क्या है सद्गृहस्थों के आठ लक्षण...

जानिए क्या है सद्गृहस्थों के आठ लक्षण...

सद्गृहस्थों के लक्षण बताते हुए महर्षि अत्रि कहते हैं कि 1-अनसूया, 2- शौच, 3 – मंगल, 4 – अनायास, 5 –स्पृहा, 6  दम,7- दान तथा 8 - दया – य़े आठ विप्रों तथा सद्गृहस्थों के लक्षण हैं । यहाँ इनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है ।

(1) अनसूया - जो गुणवान के गुणों का खण्डन नहीं करता है, स्वल्प गुण रखनेवालों की भी प्रशंसा करता है और दूसरों के दोषों को देखकर उनका परिहास नहीं करता है - यह भाव अनसूया कहलाता है।

(2) शौच - अभक्ष्य-भक्षण का परित्याग,निन्दित व्यक्तियों का संसर्ग न करना तथा आचार –(शौचाचार-सदाचार) विचार का परिपालन - यह शौचाचार कहलाता है ।

(3) मंगल – श्रेष्ठ व्यक्तियों तथा शास्त्रमर्यादित प्रशंसनीय आचरण का नित्य व्यवहार,अप्रशस्त (निन्दनीय) आचरण का परित्याग - इसे धर्म के तत्व को जानने वाले महर्षियों द्वारा मंगल नाम से कहा गया है ।

(4) अनायास – जिस शुभ अथवा अशुभ कर्म के द्वारा शरीर पीङित होता हो,ऐसे व्यवहार को बहुत अधिक न करना अथवा सहज भाव से जो आसानीपूर्वक किया जा सके उसे करने का भाव अनायास कहलाता है।

(5) अस्पृहा - स्वयं अपने – आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहना दूसरों की स्त्री की अभिलाषा नहीं रखना यह स्पृहा कहलाता है ।

(6) दम - जो दूसरों के द्वारा उत्पन्न बाह्य (शारीरिक) अथवा आध्यात्मिक दुःख या कष्ट के प्रतिकारस्वरुप उस पर न तो कोई कोप करता है और न उसे मारने की चेष्टा करता है अर्थात किसी भी प्रकार से न तो स्वयं उद्वेग की स्थिति में होता है और न दूसरे को उद्वेलित करता है, उसका यह समता मे स्थित रहने का भय दम कहलाता है ।

(7) दान - प्रत्येक दिन दान देना कर्तव्य है - यह समझकर अपने स्वल्प में से भी अन्तरात्मा से प्रसन्न होकर प्रयत्नपूर्वक यत्किंचित् देना दान कहलाता है ।

(8) दया - दूसरे में अपने बन्धुवर्ग में, मित्र में, शत्रु में तथा द्वेष करनेवाले में अर्थात सम्पूर्ण चराचर संसार में एवं सभी प्राणियों में अपने समान ही सुख-दुख की प्रतीत करना और सबमें आत्मभाव परमात्मभाव समझकर सबको अपने ही समझकर प्रीति का व्यवहार करना –ऐसा भाव दया कहलाता है ।महर्षि अत्रि कहते हैं इन लक्षणों से युक्त सद्गृहस्थ अपनें उत्तम धर्माचरण से श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त कर लेता है , पुनः उसका जन्म नहीं होता और वह मुक्त हो जाता है :

      यश्चैतैर्लक्षणैर्युक्तो गृहस्थोअपि भवेद् द्विजः ।

      स गच्छति परं स्थानं जायते नेह वै पुनः ।।

२. अगर आपको अपना व्यक्तित्व निखारना है तो अपनाइए ये सद्गुण ...

अगर आपका व्यक्तित्व निखारना है, अपना प्रभाव विकसित करना है तो जीवन में निम्न सद्गुण लाइए-

1.  कला प्रभावोत्पादक - मानवीय व्यवहार –पशु जैसा व्यवहार नहीं ,कूङ-कपट बेईमानी नहीं ,मनुष्य को शोभा दे ऐसा व्यवहार करें । कर्मों की गति गहन है ,इसलिए ऐसे कर्म करो जिससे भगवान की प्रीति जगे ।ऐसा चिंतन करो कि अपना आत्मा-परमात्मा, जो अपनें साथ है अपने पास है, उसको जानने का ललक जगे ।

2. दूसरों के महत्व को भी स्वाकार करें – दूसरों के अंदर भी गुण हैं । अपनें द्वारा उनका विकास हो तो अच्छा है, नहीं तो उनका अंदर से मंगल चाहें । डाँटे तो भी मंगल की भावना से ।

3. आनंदित रहें,प्रसन्न रहें मित्र भावना से संपन्न रहें- आनंदित और प्रसन्न रहने के लिए बैठे-बैठे या लेटे-लेटे दोनों नथुनों से खूब श्वास लें,पेट भर लें फिर अशांति खिन्नता और रोग के कण बाहर निकल रहे हैं ऐसी भावना करते हुए मुँह से छोङें । इससे निरोगता भी बढेगी और प्रसन्नता भी बढेगी । रोज सुबह 10 से 12 बार ऐसा कर लें ।

4. दूसरों के लिए हितकारी भावना और अपने लिए मितव्यय – अपने लिए ज्यादा ऐश नहीं । अपने लिए ज्यादा खर्च न करें और लोगों के हित की भावना करें ।

5.संतुलित मनोरंजन - मनोरंजन हो विनोद हो लेकिन वह भी संतुलित हो, नियंत्रित हो । मनोरंजन की सीमा हो ।

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