गर्भपात महापाप

अपने ही बच्चे की गर्भ में नृशंस हत्या करवाने से शरीर रोगों का घर बन जाता है और परिवार कलह, अशांति की भीषण ज्वालाओं में झुलसने लगता है । प्रसवकाल में माँ के शरीर को जितना खतरा होता है, उससे दुगुना खतरा उसे गर्भपात करवाने से होता है ।

पाराशर स्मृति (4.20) में आता है –यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने ।

अर्थ -ब्रह्महत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात करने से लगता है ।

गर्भ में शिशु को अपने पूर्व जन्मों का भी स्मरण रहता है । इसीलिए गर्भस्थ शिशु को शास्त्रों में ऋषि की संज्ञा दी गई है । गर्भस्थ शिशु हत्या करने से ऋषि हत्या का पाप लगता है । अतः इस घोर पाप से स्वयं भी बचें व औरों को भी बचाने में सहभागी बनें ।

गर्भपात के भयंकर दुष्परिणाम

 स्तन-कैंसर की संभावना में 30 प्रतिशत की वृद्धि ।
 महिलाओं में हार्मोन्स का स्तर कम होने से फिर से बच्चे होने की सम्भावना में कमी ।
 यदि संतान होती है तो उसके कमजोर और अपंग होने की संभावना ।
 मासिक धर्म में खराबी, कमरदर्द की शिकायत बढ़ जाती है तथा माँ की मृत्यु तक हो सकती है ।
 सर्वाइकल कैंसर का ढाई गुना व अंडाशय (ओवेरियन) कैंसर का 50 प्रतिशत अधिक खतरा ।
 मनोबल में कमी, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, आत्महत्या के विचारों व मानसिक तनाव में वृद्धि ।
 गर्भपात के समय इन्फेक्शन होने पर जानलेवा पी. आई. डी. ( पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिसीज ) की संभावना अधिक हो जाती है ।
 गर्भपात करानेवाली 50 प्रतिशत महिलाओं में फिर से गर्भपात होने की संभावना बढ़ जाती है ।

अपने-आप पर अत्याचार, आखिर क्यों ?

“गर्भपात संतान के विनाश के साथ पुण्याई तो नष्ट करता ही है, साथ ही माता के स्वास्थ्य का भी विनाश करता है । अतः दवाइयों या कातिल साधनों से अपने निर्दोष शिशु के टुकड़े करवाकर घातक बीमारियों के शिकार और महापाप का भागी बनना कहाँ तक उचित है ?”

- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

“गर्भस्थ शिशु को अनेक जन्मों का ज्ञान होता है इसलिए श्रीमद् भागवत में उसको ऋषि (ज्ञानी) कहा गया है । गर्भपात यह कितना बड़ा पाप है ! रावण और हिरण्यकशिपु के राज्य में भी गर्भपात जैसा महापाप नहीं हुआ था !आज यह महापाप घर-घर हो रहा है । यदि माँ ही अपनी संतान का नाश कर दे तो फिर किससे रक्षा की आशा करें ?”

- स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज

अतः सभी पवित्र आत्माओं और देश के जागरुक नागरिकों से अनुरोध है कि इस अभियान का प्रत्येक क्षेत्र में प्रचार-प्रसार करें तथा इस भयानक पाप के भागीदार न स्वयं बनें न दूसरों को बनने दें ।

महिला उत्थान मंडल द्वारा गर्भपात व सिजेरियन डिलेवरी को रोकने के लिए गर्भपात रोको सेमिनारों का आयोजन किया जाता है, जिसमें अनुभवी डॉक्टरों तथा विशेषज्ञों द्वारा गर्भपात से होनेवाली हानियों तथा उससे बचने के उपायों की जानकारी दी जाती है । गर्भपात व सिजेरियन डिलीवरी से सावधान के पैम्फ्लेट्स व फ्लैक्स आदि जनसेवा में बाँटकर गर्भपात न कराने का संकल्प भी करवाया जाता है ।

गर्भपात महापाप
गर्भपात महापाप

 

गर्भपात के समान दूसरा कोई भयंकर पाप है ही नहीं । ''पाराशर स्मृति'' में आया है :

यत्पापं ब्रम्हहत्याया व्दिगुणं गर्भपातने ।

प्रायश्चितं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते ।।

'ब्रम्हहत्या से जो पाप लगता है उससे दुगना पाप गर्भपात करने से लगता है । इस गर्भपातरूप  महापाप का कोई प्रायश्चित भी नहीं है, इसमें तो उस स्त्री का त्याग कर देने का ही विधान है ।'

यदि अन्न पर गर्भपात करनेवाले की दृष्टि भी पड़ जाय तो वह अन्न अभक्ष्य हो जाता है ।

गर्भस्थ शिशु  को अनेक जन्मों का ज्ञान होता है ।इसलिए श्रीमद्भागवत में उसको ऋषि (ज्ञानी) कहा गया है । अत उसकी हत्या से बढ़कर और क्या पाप होगा ?

संसार का कोई भी श्रेष्ठ धर्म गर्भपात को सर्मथन नहीं देता है और ना दे सकता है क्योंकि यह कार्य मनुष्यता के विरूद्ध है । जीवमात्र को जीने का अधिकार है । उसको गर्भ में ही नष्ट करके उसके  अधिकार को छीनना महापाप है । गर्भपात एक जीवित मनुष्य की हत्या है – इस बात को अब विदेशी डॉक्टर भी मानने लगे हैं । उन्होने साइलेंट स्क्रीम (मूक चीख) नाम से गर्भस्थ शिशु की नृशंस हत्या (गर्भपात) दिखानेवाली एक फिल्म भी बना ली है, जिसे संस्था द्वारा समय–समय पर देश भर के विभिन्न स्थानों पर दिखाया जाता है । गर्भ में बालक निर्बल और असहाय अवस्था में रहता है । वह अपने बचाव का कोई उपाय भी नहीं कर सकता तथा अपनी हत्या का प्रतिकार भी नहीं कर सकता । अपनी हत्या से बचने के लिए वह पुकार भी नहीं सकता, रो भी नहीं सकता । उसका कोई अपराध, कसूर भी नहीं है – ऐसी अवस्था में जन्म लेने से पहले ही उस निरपराध, निर्दोष, असहाय बच्चे की हत्या कर देना पाप की, कृतघ्नता की, दुष्टता की, नृशंसता की, क्रूरता की, अमानुषता की, अन्याय की आखिरी हद है । धर्मप्रधान देश भारत में व्यापक  रूप से ऐसे महापाप का होना बड़े ही कलंक की बात है । मुसलमान भाई तो कहते हैं कि संतान होना खुदा का विधान है। उसको बदलने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। जो उसके विधान को बदलते हैं वे अनधिकार चेष्टा करते है। परिवार-नियोजन करनेवालों की संख्या कम हो जाती है । अतः मुसलमानों ने यह सोचा कि परिवार-नियोजन नहीं करेंगे तो अपनी जन-संख्या बढ़ेगी और जन-संख्या बढ़ने से अपना ही राज्य होगा । परंतु हिन्दू केवल अपनी थोड़ी-सी-सुख-सुविधा के लिये नसबन्दी,गर्भपात आदि महापाप करने में लगे हुए हैं । परलोक में इस महापाप का भयंकर दुख भोगना पडेगा । इस तरफ भी उनकी दृष्टि नहीं है। केवल खाने-पीने , सुख भोगने की तरफ तो पशुओं की भी दृष्टि रहती है। अगर यही दृष्टि मनुष्य की भी है तो यह मनुष्यता नहीं है । फ्रांस , इंग्लैण्ड , इटली , स्वीडन आदि देशों ने भी संतति निरोध पर प्रतिबन्ध लगाया । इटली में तो यहाँ तक कानून बना दिया गया कि संतति निरोध का प्रचार एवं प्रसार करनेवाले को एक वर्ष की कैद तथा जुर्माना किया जा सकता है । आश्चर्य की बात है कि परिवार-नियोजन के जिन दुष्परिणामों को पश्चिमी देश भुगत चुके है , उनको देखने के बाद भी भारत सरकार इस कार्यक्रम को बढ़ावा दे रही है ।

विनाशकाले विपरीत बुद्धि !

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