पर्यावरण सुरक्षा / वृंदा 'घर-घर तुलसी लगाओ' अभियान

 

पर्यावरण घातक वृक्ष हटायें|
आरोग्य, समृद्धि व पुण्य प्रदायक वृक्ष लगायें||

 

       वास्तव में प्रकृति और आप एक दूसरे से जुड़े हैं । आप जो श्वास छोड़ते हैं वह वनस्पतियाँ लेती हैं और वनस्पतियाँ जो श्वास छोड़ती हैं वह आप लेते हैं । आपके भाई-बंधु हैं वनस्पतियाँ ।

       हम एक दिन में लगभग 1-1.5 किलो भोजन करते हैं, 2-3 लीटर पानी पीते हैं लेकिन 21600 श्वास लेते हैं । उसमें 11 हजार लीटर हवा लेते छोड़ते हैं, जिससे हमें 10 किलो भोजन का बल मिलता है । अब यह वायु जितनी गंदी (प्रदूषित) होती है, उतना ही लोगों का (वायुरूपी) भोजन कमजोर होता है तो स्वास्थ्य भी कमजोर होता है । अतः नीम, पीपल, आँवला, तुलसी वटवृक्ष और दूसरे जो भी पेड़ हितकारी हैं वे लगायें और हानिकारक पेड़-नीलगिरी, अंग्रेजी बबूल व गाजर-घास हटायें ।

       भारतीय संस्कृति में वटवृक्ष, पीपल, नीम, तुलसी को पूजनीय माना जाता है और बड़ी श्रद्धा से पूजा की जाती है। प्राचीन काल में लोग शांति के लिए जिस प्रकार इन्द्र, वरुण आदि देवताओं की प्रार्थना करते थे, उसी प्रकार वृक्षों की भी प्रार्थना करते थे।

वनिनो भवन्तु शं नौ। (ऋग्वेदः 7.35.5)

अर्थात् ‘वृक्ष हमारे लिए शांतिकारक हों।’ यज्ञ का जीवन वृक्षों की लकड़ी को ही माना गया है। यज्ञों में समिधा के निमित्त बरगद, गूलर, पीपल और पाकड़ (प्लक्ष) इन्हीं वृक्षों की लकड़ियों को विहित माना गया है और कहा गया है कि ये चारों वृक्ष सूर्य-रश्मियों के घर हैं।

‘एते वै गन्धर्वाप्सरसां गृहाः।’ (शत. ब्राह्मण)
पीपल से मिलती आरोग्यता, सात्त्विकता व होती बुद्धिवृद्धि

पीपल सात्त्विक वृक्ष है । पीपल देव की पूजा से लाभ होता है, उनकी सात्त्विक तरंगें मिलती हैं । हम भी बचपन में पीपल की पूजा करते थे । इसके पत्तों को छूकर आने वाली हवा चौबीसों घंटे आह्लाद और आरोग्य प्रदान करती है । बिना नहाये पीपल को स्पर्श करते हैं तो नहाने जितनी सात्त्विकता, सज्जनता चित्त में आ जाती है और नहा-धोकर अगर स्पर्श करते हैं तो दुगुनी आती है । बालकों के लिए पीपल का स्पर्श बुद्धिवर्धक है । बालकों को इसका विशेषरूप से लाभ लेना चाहिए । रविवार को पीपल का स्पर्श न करें । पीपल के वृक्ष से प्राप्त होने वाले ऋण आयन, धन ऊर्जा स्वास्थ्यप्रद हैं । अतः पीपल के पेड़ खूब लगाओ । अगर पीपल घर या सोसायटी की पश्चिम दिशा में हो तो अनेक गुना लाभकारी है ।

स्वास्थ्य के लिए परम हितकारी – पीपल

पीपल के सभी अंग उपयोगी व अनेक औषधीय गुणों से भरपूर हैं। जहाँ एक ओर यह वृक्ष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व रखता है, वहीं दूसरी ओर आयुर्वेदिक और आर्थिक तौर पर भी महत्वपूर्ण है। पीपल में भगवद्भाव रखकर जल चढ़ाने तथा परिक्रमा करने से आध्यात्मिक लाभ के साथ स्वास्थ्य लाभ सहज में ही मिल जाता है।

आरोग्यप्रद नीम

रात को भी नीम की हवा आरोग्यप्रद है | ब्रह्मचर्य पालने में और पित्त-शमन करने में नीम का रस बड़ा काम करता है | जिनको पित्त, गर्मी या चमड़ी की तकलीफें हैं या रक्तस्त्राव बार-बार होता है, वे नीम की दातुन करके उसका रस लें तो इनमें राहत मिलेगी, नकसीर फूटना या बवासीर के मस्से या अन्य अंग से रक्त बहना कम हो जायेगा | नीम के पत्ते भी फायदा करते हैं |

पुण्यप्रदायक आँवला

शास्त्रों में आँवले के वृक्ष की बड़ी भारी महिमा वर्णित है | आँवला सृष्टि का आदिवृक्ष है | सृष्टि की शुरुआत में भगवान् नारायण की प्रसादीस्वरूप जो कुछ गिरा, उसीमें से आँवले का वृक्ष पैदा हुआ है | इसके सुमिरन से गोदान का फल होता है | स्पर्श से दोगुना और इसका फल खाने से तिगुना फल होता है | आँवला पोषक और पुण्यदायी है | इसके वृक्ष के नीचे ध्यान, जप करने से कोटि गुना फल होता है |
(ऋषि प्रसाद, अंक - 317,318)

वटवृक्ष की महत्ता

भारत के महान वैज्ञानिक श्री जगदीशचन्द्र बसु न क्रेस्कोग्राफ संयंत्र की खोज कर यह सिद्ध कर दिखाया कि वृक्षों में भी हमारी तरह चैतन्य सत्ता का वास होता है। इस खोज से भारतीय संस्कृति की वृक्षोपासना के आगे सारा विश्व नतमस्तक हो गया।
वटवृक्ष विशाल एवं अचल होता है। हमारे अनेक ऋषि-मुनियों ने इसकी छाया में बैठकर दीर्घकाल तक तपस्याएँ की हैं। यह मन में स्थिरता लाने में मदद करता है एवं संकल्प को अडिग बना देता है। हमारे शास्त्रों के अनुसार वटवृक्ष के दर्शन, स्पर्श, परिक्रमा तथा सेवा से पाप दूर होते हैं तथा दुःख, समस्याएँ एवं रोग नष्ट होते हैं। ‘भावप्रकाश निघंटु’ग्रंथ में वटवृक्ष को शीतलता-प्रदायक, सभी रोगों को दूर करने वाला तथा विष-दोष निवारक बताया गया है।
वटवृक्ष की व्याख्या इस प्रकार की गयी है।

वटानि वेष्टयति मूलेन वृक्षांतरमिति वटे।
‘जो वृक्ष स्वयं को अपनी ही जड़ों से घेर ले, उसे वट कहते हैं।’

वटवृक्ष हमें इस परम हितकारी चिंतनधारा की ओर ले जाता है कि किसी भी परिस्थिति में हमें अपने मूल की ओर लौटना चाहिए और अपना संकल्पबल, आत्म-सामर्थ्य जगाना चाहिए। इसी से हम मौलिक रह सकते हैं। मूलतः हम सभी एक ही परमात्मा के अभिन्न अंग हैं। हमें अपनी मूल प्रवृत्तियों को, दैवी गुणों को महत्त्व देना चाहिए। यही सुखी जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

स्वास्थ्य व समृद्धि प्रदायक तुलसी

तुलसी सम्पूर्ण धरा के लिए वरदान है, अत्यंत उपयोगी औषधि है, मात्र इतना ही नहीं, यह तो मानव जीवन के लिए अमृत है । यह केवल शरीर स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं, अपितु धार्मिक, आध्यात्मिक, पर्यावरणीय एवं वैज्ञानिक आदि विभिन्न दृष्टियों से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है ।

विज्ञान ने विभिन्न शोधों के आधार पर माना है कि तुलसी एक बेहतरीन रोगाणुरोधी, तनावरोधी, दर्द-निवारक, मधुमेहरोधी, ज्वरनाशक, कैंसरनाशक, चिंता-निवारक, अवसादरोधी, विकिरण-रक्षक है । तुलसी इतने सारे गुणों से भरपूर है कि इसकी महिमा अवर्णनीय है । पद्म पुराण में भगवान शिव कहते हैं कि "तुलसी के सम्पूर्ण गुणों का वर्णन तो बहुत अधिक समय लगाने पर भी नहीं हो सकता ।"

 

अपने घर में, आस पड़ोस में अधिक-से-अधिक संख्या में तुलसी के वृक्ष लगाना-लगवाना माना हजारों-लाखों रूपयों का स्वास्थ्य खर्च बचाना है, पर्यावरण-रक्षा करना है ।

हमारी संस्कृति में हर-घर आँगन में तुलसी लगाने की परम्परा थी । संत विनोबाभावे की माँ बचपन में उन्हें तुलसी को जल देने के बाद ही भोजन देती थीं । पाश्चात्य अंधानुकरण के कारण जो लोग तुलसी की महिमा को भूल गये, अपनी संस्कृति के पूजनीय वृक्षों, परम्पराओं को भूलते गये और पाश्चात्य परम्पराओं वतौर तरीकों को अपनाते गये, वे लोग चिंता, तनाव, अशांति एवं विभिन्न शारीरिक-मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हो गये ।

समाज को पुनः भूली हुई संस्कृति की ओर ले जाते हुए तुलसी के गुणों से लाभान्वित करवाने के उद्देश्य से परम पूज्य आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा से प्रतिवर्ष श्रावण मास से कार्तिक मास में वृंदा (घर-घर तुलसी लगाओ) अभियान किया जाता है ।

धन-धान्य, स्वास्थ्य-सौभाग्य प्रदायक तुलसी :

  • ईशान कोण में तुलसी का पौधा लगाने से तथा पूजा के स्थान पर गंगाजल रखने से घर में लक्ष्मी की वृद्धि होती है ।
  • सोमवती अमावस्या के दिन तुलसी की १०८ परिक्रमा करने से दरिद्रता का नाश होता है ।
  • एक गिलास गुनगुने पानी में एक नींबू का रस व २५ तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर सुबह खाली पेट पीने से हृदय की रक्त वाहिनियों का अवरोध (blockage) दूर हो जाता है । यह प्रयोग हफ्ते में २-३ बार नियमित रूप से करें । इसके अतिरिक्त चरबी व चरबी की गाँठे भी पिघल जाती हैं ।
  • मोटे व्यक्तियों व हृदयरोगियों के लिए यह प्रयोग वरदानस्वरूप है ।
  • प्रातः खाली पेट तुलसी का रस पीने अथवा ५-७ पत्ते चबाकर पानी पीने से बल, तेज और स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है ।
  • अग्नि-संस्कार में तुलसी की लकड़ी शरीर पर रखने से नीच योनियों से रक्षा सुनिश्चित है ।

" नीलगिरी और बबूल (कीकर) हटाओ (ये वृक्षवायु को गंदा करते हैं, जीवनीशक्ति हरते हैं), पीपल, तुलसी, नीम, आँवला बढ़ाओ । ये वृक्ष लगाने से आपके द्वारा प्राणिमात्र की बड़ी सेवा होगी । खुद वृक्ष लगाना और दूसरों को प्रेरित करना भी एक सेवा है । राष्ट्रीय कर्तव्य है पर्यावरण के लिए पेड़ लगाना । हम पेड़ को प्रेम करते हैं और पेड़ हमारे स्वास्थ्य के लिए और पर्यावरण के लिए वरदान हैं, आशीर्वाद हैं । "
-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
(संदर्भ - तुलसी रहस्य पुस्तक)

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तुलसी - औषधीय प्रयोग व आध्यात्मिक महत्व

                                                     तुलसी के औषधीय प्रयोग

  • कान के रोगः तुलसी की पत्तीयों को ज्यादा मात्रा में लेकर सरसों के तेल में पकायें। पत्तियाँ जल जाने पर तेल उतारकर छान लें । ठंडा होने पर इस तेल की 1-2 बूँद कान मे डालने से कान के रोगों में लाभ होता है।
  • वजन घटाने के लिएः 1 गिलास गुनगुने पानी में 1 नींबू का रस समभाग मिलाकर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।
  • दादः तुलसी-पत्तों का रस और नींबू का समभाग मिलाकर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।
  • खाँसीः (1) आधा चम्मच तुलसी-रस में आधा चम्मच अदरक रस व 1 चम्मच शहद मिलाकर चाटने से खाँसी में लाभ होता है।

     (2) तुलसी व अडूसे के पत्तों का रस बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से पुरानी खाँसी में लाभ होता है।

  • आधासीसीः तुलसी-पत्ते व काली मिर्च पीसकर उनका रस निकाल लें। एक-एक बूँद रस नाक में डालने से आधासीसी मे लाभ होता है।
  • सौंदर्यः तुलसी और नींबू का रस समभाग मिलाकर सुबह-शाम चेहरे पर घिसने से काले दाग दूर होते हैं और सुंदरता बढ़ती है।

 

                              तुलसी का आध्यात्मिक महत्व

  • तुलसी के निकट जो भी मंत्र-स्त्रोत आदि का जप-पाठ किया जाता है, वह सब अनंत गुना फल देनेवाला होता है।
  • तुलसी के नाम-उच्चारण से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • कलियुग में तुलसी का पूजन, कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण करने से वह पाप को जलाती और स्वर्ग एंव मोक्ष प्रदान करती है।
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