Importance of Divya Shishu Sanskar

Importance of Divya Shishu Sanskar

दिव्य शिशु संस्कार

किसी भी देश का भविष्य वहाँ की संस्कारी बाल पीढ़ी पर ही निर्भर करता है | वास्तव में खनिज , वन , पर्वत , नदी आदि देश की सच्ची संपत्ति नहीं हैं | अपितु ऋषि-परम्परा के पवित्र संस्कारों से सम्पन्न तेजस्वी संतानें ही देश की सच्ची सम्पति हैं और वर्तमान समय में देश को इस सम्पति की अत्यंत आवश्यकता है | शिशु में संस्कारों की नींव माँ के गर्भ में ही पड़ जाती है | गर्भावास्था में शिशु व माता का बहुत ही प्रगाढ़ संबंध होता है | हमारे ऋषि-मुनि अनादिकाल से ही यह बताते आ रहे हैं कि बच्चे को गर्भावास्था में जिस प्रकार के संस्कार मिलते हैं , आगे चलकर वह वैसा ही बन जाता है | ऐसे कई उदाहरण इतिहास में पाये जाते हैं | जैसे :-

१.  अभिमन्यु ने माता के गर्भ में रहते हुए ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने की कला पिता द्वारा सुनी  | गर्भस्थ अभिमन्यु पर इस विवरण का इतना प्रभाव पड़ा कि ‘महाभारत’ के भीषण युद्ध में गर्भावस्था में जानी हुई विद्या का उपयोग करके वह चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया |

२.  गर्भावस्था में देवर्षि नारदजी ने माता कयाधू को ज्ञान - भक्ति का उपदेश दिया था | उसका प्रभाव गर्भस्थ प्रह्लाद पर पड़ा | इसलिए पिता इश्वरद्रोही होते हुए भी पुत्र महान भगवद्भक्त हुआ |

कुम्हार मिट्टी को जैसा चाहे वैसा आकार दे सकता है परंतु आंवे में पक जाने पर उसके आकार में चाहकर भी परिवर्तन नहीं कर सकता | ठीक इसी प्रकार माँ के गर्भ में शिशु के शरीर का निर्माण हो जाने पर एवं उसके मस्तिष्क में विविध शक्तियों का उत्तम या कनिष्ठ बीज प्रस्थापित हो जाने के बाद , उसके अंत:करण में सदगुण या दुर्गुणों की छाप दृढ़ता से स्थापित हो जाने के बाद शारीरिक - मानसिक उन्नति में पाठशाला , महाशाला एवं विविध प्रकार के प्रशिक्षण इच्छित परिणाम नहीं ला पाते क्योंकि माँ के आहार – विहार व विचारों से ही गर्भस्थ शिशु पोषित व संस्कारित होता है |     

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