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कौन-सी नारी पृथ्वी को पवित्र करती है ?
कौन-सी नारी पृथ्वी को पवित्र करती है ?

 

लज्जा वासो भूषणं शुध्दशीलं पादक्षेपो धर्ममार्गे च यस्या: ।

नित्यं पत्यु:सेवनं मिष्टवाणी धन्या सा स्त्री पूतयत्येव पृथ्वीम् ।।

'जिस स्त्री का लज्जा ही वस्त्र एवं विशुद्ध भाव ही भूषण हो, धर्ममार्ग में जिसका प्रवेश हो, मधुर वाणी बोलने का जिसमें गुण हो वह पतिसेवा-परायण श्रेष्ठ नारी इस पृथ्वी को पवित्र करती है ।

भगवान शंकर महर्षि गर्ग से कहते हैं :

'जिस घर में सर्वगुणसम्पन्ना नारी सुखपूर्वक निवास करती है, उस घर में लक्ष्मी अवश्य निवास करती है । हे वत्स्य ! कोटि देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते ।'

लोग घरबार छोड़कर साधना करने के लिये साधू बनते हैं । घर में रहते हुए, गृहस्थधर्म निभाते हुए नारी ऐसी उग्र साधना कर सकती है कि अन्य साधुओं की साधना उसके सामने फीकी पड़ जाती है । ऐसी देवियों के पास एक पतिव्रता-धर्म ऐसा अमोध शस्त्र है जिसके सम्मुख बड़े-बड़े वीरों का शस्त्र भी कुंठित हो जाते हैं । पतिव्रता स्त्री अनायास ही योगियों के समान सिद्धि प्राप्त कर लेती है, इसमें किंचित् मात्र भी संदेह नहीं है, सती अनसूया ने ब्रह्मा, विष्णु और शंकर, इन तीनों देवों को अपने पतिव्रत धर्म के बल से छः - छः महीने के दूध पीते बच्चे बना दिये थे । सती शाण्डिली ने सूर्य की गति को रोक दिया था । सती सावित्री ने अपने भर्ता के प्राण यमराज से वापिस प्राप्त किये थे ।

एक ही जन्म में एक पतिनिष्ठ रहती है वह पतिव्रता है । सत्य संकल्प से अन्य जन्म में भी उसी पति को प्राप्त करती है वह सती है ।

यही फासला साधू और संतों के बीच में हैं । साधू की मेहनत जारी है, संत की सब मेहनत पूर्ण हो गई है । जैसे सती में पति से ज्यादा सामर्थ्य आ जाता है वैसे संत में इष्ट से भी ज्यादा सामर्थ्य आ जाता है ।

ऐसे संत कबीरजी कहते हैं :

               पीछे पीछे हरि फिरे कहत कबीर कबीर ।

सती-साध्वी नारी अपने पातिव्रत्य के प्रभाव से पापी पुरुष की पाप-भावनाओं को नष्ट कर सकती है । रावण के साम्राज्य में अकेली सीता माता ने अपना संरक्षण इसी बल पर किया था ।

ऐसी पतिव्रता, साध्वी, भक्त, योगिनी एवं आध्यात्मिकता में जगी हुई ब्रह्मनिष्ठ महान नारियाँ इस पृथ्वी को पवित्र करती हैं । पृथ्वी पर जितने तीर्थ हैं वे सभी साध्वी नारियों में भी निवास करते हैं । देवताओं और मुनियों का तेज सती स्त्रियों में स्वभावतः ही रहता है ।

सतीनां पादरजसा सद्य: पूता वसुन्धरा ।

सतियों की चरणरज से पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है ।

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