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विवाह का प्रयोजन
विवाह का प्रयोजन

 

   हरेक जीव, नर हो या नारी, अनादि काल से वासनाओं से पीडित होते आ रहा है । वासना की तुष्टि के लिए वह नये-नये शरीर धारण करता है और रस लेने में प्रयत्नशील रहता है । परंतु इस आनंद-प्राप्ति के प्रयास से ही वह बेचारा अपने स्वतः प्राप्त वास्तविक आनंद से, आत्मानंद वंचित रह जाता है । आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाए तो जीव खुद ही आनंद का खजाना है । परंतु वह आने भीतर का यह रहस्य जानता नहीं है और विषयों में आनन्द ढूँढते-ढूँढते वासनाओं से पीढित होकर जन्म-मरण के चक्र में घूमता है ।

   यदि जीव को मुक्ति पाना है, आनंद-स्वरूप पाना है तो उसे पूर्णरूप से वासना रहित होना ही पड़ेगा । एकाएक वासनाओं का सर्वथा त्याग करना सम्भव नहीं है । उसमें भी सबसे प्रबल वासना है कामभोग की । इस प्रबल उच्छृंखल प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने के लिए विवाह की एक मर्यादा रखी गई है । विवाह का मूल प्रयोजन है क्रमशः वासना-निवृत्ति, वासना-पूर्ति नहीं । आजकल के लोग इस लक्ष्य को भूलते जा रहे हैं । विवाह के द्वारा वे अपनी वासनापूर्ति की अधिक से अधिक सुविधाएँ निकालने को तत्पर हैं । परिणाम में विवाह का आध्यात्मिक उद्देश्य लुप्त होता जा रहा है  । पुरुष और स्त्री के तन, मन और बुद्धि का क्षय होता जा रहा है । अति विकारी होने से, अधिक काम भोगने से वीर्य दुर्बल होता है और उस कारण से दुर्बल तन, मन और बुद्धि वाले बालक पैदा होते हैं  । इस प्रकार जीवन कभी वासना रहित नहीं हो सकेगा, अपने असली घर में नहीं पहुँच सकेगा और सच्चे विश्राम व शांति का अनुभव नहीं कर सकेगा  । विवाह का दृढ़ धर्म-बंधन ही जीव को वासनाजाल से मुक्त कर परमार्थ पद की प्राप्ति करा सकता है  ।

जब विवेक द्वारा यह विचार स्पष्ट हो जाता है कि वासनाओं का नियंत्रण ही विवाह का प्रयोजन है तब भोगवासना के हेतु से रूप, यौवन आदि को ध्यान में रखकर विवाह करना यह तो विपरीत मार्ग है । गुरुजनों की आज्ञा मानकर, धर्म को सामने रखकर, वासनारूपी रोग के निवारण के लिए औषधि समझकर ही विवाह करना चाहिए । स्त्री-पुरुष सम्पर्क के सभी विधि-निषेधों का मूल तत्त्व यही है ।

   नारी को किसी भी दृष्टि से पिता, भाई, पुत्र मानकर भी परपुरुष से हेल-मेल नहीं बढ़ाना चाहिए । भगवान श्रीरामचंद्रजी जब अत्रि मुनि के आश्रम गये तब अनसूयाजी उन्हें प्रणाम करने तक नहीं आयी, मिलने की तो बात ही दूर है । लंका में  हनुमानजी ने सीता माता से जब कहा कि 'आप मेरी पीठ पर बैठकर भगवान के पास चलें तब सीताजी ने स्पष्ट कहा कि 'अपहरण के समय विवशता के कारण मुझे रावण का स्पर्श सहन करना पड़ा । अब मैं जान-बूझकर तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकती ।'

    सती-साध्वी नारियों के अन्तःकरण स्वतः ही पवित्र होते हैं । तभी तो अग्नि भी उन्हें नहीं जला सकती । सूर्य भी उनकी आज्ञा मानने को बाध्य होता है । ऐसे महान् दिव्य पद की प्राप्ति के साधनभूत यह विवाह संस्कार खड़ा किया गया था मगर आजकल तो कुछ और ही नजर आता है । नारी स्वयं अपना स्वरूप और गौरव भूलती जा रही है । वासनापूर्ति की सड़क पर तीव्र गति से भागी जा रही है वेश-भूषा, पफ-पावडर ,काजल-लिपिस्टिक से सजधज कर मनचले लोगों की आंखें अपनी ओर आकर्षित करने में संलग्न है । वह अपने को ऐसे रूप में उपस्थित करना चाहती है मानो 'स्व' और 'पर' की वासनाएँ पूरी करने की कोई मशीन हो बड़े खेद की बात है, जो मनुष्य जन्म 'स्व' और 'पर' के परम श्रेय परमात्म-प्राप्ति में लगाना था उसके बजाय वह अपना अमूल्य जीवन बरबाद कर रहा है । उनकी स्थिति दयाजनक है ।

        'उमा तिनके बड़े अभाग, जो नर हरि तजी विषय भजहिं '

 

 

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