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सतीत्व का संरक्षण

 

कन्या जब यौवनावस्था में प्रवेश कर रही हो तब उसके माता-पिता का पवित्र कर्तव्य हो जाता है कि उसके ये अति संवेदनशील एवं नाजुक काल में उसके चित्त का संरक्षण होता रहे ऐसा वातावरण बनायें । सत्साहित्य के पठन, मनन एवं संतजनों के दर्शन-सत्संग से कार्य स्वाभाविक ढंग से उत्तम प्रकार से सम्पन्न हो जाता है ।

११ साल के बाद बच्ची का जीवन सात्विक सरल होना चाहिए । सती-साध्वी नारियों के जीवन की कथाएँ उसे पढ़नी चाहिये । लड़कों के साथ ज्यादा संपर्क न रहे । क्योंकि स्त्री इस काल से ही पुरुषों से आकर्षित होने लगती है ।

किसीसे भी आकर्षित होने से शक्ति बिखर जाती है । आद्यशक्ति के रूप में होते हुए भी जब शक्ति का क्षय कर बैठती है तब 'अबला' होकर ठोकरें खाती है । ऋषियों ने जगदम्बा के रूप में बाला की पूजा की है । चित्त में जब अनजाने पुरुष को बिठा लेती है तो वही बाला 'अबला' (बलहीन) हो जाती है ।

आदर्श सती वही है जो पति के सिवा किसीको पुरुषरूप में देखती ही नहीं । यदि देखती है तो पिता, भ्राता या पुत्र के रूप में । परंतु ऐसी देखनेवाली भी माध्यम श्रेणी की पतिव्रता मानी गई है । गौस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं :

उत्तम के अस बस मांहीं । सपने हुँ आन पुरुष जग नाहीं ।।

माध्यम पर-पति देखहिं कैसे । भ्राता पिता पुत्र निज जैसे ।।

रजोदर्शन प्रकृति का एक महान संकेत है । इसके तीन साल बाद स्त्री-गर्भ के धारण योग्य हो जाती है । इसीलिए ऋतुकाल में स्त्रियों की काम-वासना बलवती हुआ करती है । यह वासना उसे बलात् पुरुष-दर्शन करवाती है । इसी समय यदि पति के द्वारा अन्तःकरण सुरक्षित नहीं होता तो उसके चित्त पर अनेकों पुरुषों की छाया पड़ती है, जिससे उसका आदर्श सतीत्व नष्ट हो जाता है । ऋतुमती स्त्री के चित्त की स्थिति ठीक फ़ोटो के कैमरे सी होती है । ऋतुस्नान करके वह जिस पुरुष को मन से देखती है, उसकी मूर्ति चित्त पर आ जाती है ।

पुरुष के लिये स्त्री का चित्त जितना-जितना बिखरता है उतना-उतना बल नष्ट हो जाता है । अतः माता-पिता का प्रथम कर्तव्य है कि अपनी निर्दोष कुमारिकाओं, बच्चियों को भ्रष्टता की ओर ले जानेवाले सिनेमा-नाटक आदि के वातावरण से युक्तिपूर्वक बचायें, अनजाने लड़कों से, व्यक्तियों से सुरक्षित रखें । ऐसी सहेलियों से भी बचते रहें जो खुद 'अबला' हो चुकी हों, पुरुषों के गहरे चित्र चित्त में ले चुकी हों । ऐसी सुरक्षा प्रारम्भ से ही मिलने से स्त्री में सतीत्व पनपता है, पूर्णरूप से प्रकटता है । वह चरित्रवान, सुशील बनकर परिवार, समाज, देश एवं पूरी पृथ्वी को पावन करती है ।

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