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माँ बच्चों में भगवत्प्रेम कैसे जगाये ?

 

माता को शिशु का प्रथम गुरु कहा गया है । हमारे सत्शास्त्रों में माता मदालसा को आर्यमाता का आदर्श माना जाता है । उन्होंने अपने पुत्रों को बचपन में वेदांती लोरियाँ सुनाते हुए ब्रह्मज्ञान का अमृत पिलाकर ब्रह्मवेत्ता बना दिया था । माता सुनीति की प्रेरणा पाकर बालक ध्रुव ने अटल पदवी प्राप्त की । बालक कँवरराम माता की सत्शिक्षा से संत कँवरराम होकर अमर एवं पूजनीय हो गये । छत्रपति शिवाजी महाराज की महानता के पीछे उनकी माता जीजाबाई के अविस्मरणीय योगदान को कौन भुला सकता है ? ऐसे ही पूज्य माता माँ महँगीबा ने भी बालक आसुमल में महानता के बीच बचपन से ही डालने शुरू कर दिये थे ।

पूज्य बापूजी स्वयं इस बारे में बताते हैं : "बचपन में मेरे गुरु कौन थे पता है ?

बचपन में मेरी माँ ही मेरी गुरु थीं । मेरे को बोलती थीं :  "तेरे को मक्खन-मिश्री खाना है ?"

मैं कहता : "हाँ ।"

तो बोलतीं : "जा, आँखें मूँद के कृष्ण के आगे बैठ ।"

तो हमारे पिता तो नगरसेठ थे, घर में तो खूब सम्पदा थी । जब मैं ध्यान करने बैठता तो माँ चाँदी की कटोरी में मक्खन-मिश्री धीरे-से खिसका के रख देती थीं । लेकिन मैं मक्खन-मिश्री देखने बैठूँ तो नहीं रखती थी । बोलती : "खूब जप कर, बराबर ध्यान करेगा तभी मिलेगा ।"

फिर बराबर ध्यान करता तो माँ मक्खन-मिश्री की कटोरी चुपके-से रख देतीं । पढ़ने जाता तो बोलतीं : 'पेन चाहिए तुझे ? किताब चाहिए ?... भगवान से माँग ।"

वे मँगा के रखतीं और जब मैं ध्यान करने बैठता तो भगवान के पास धीरे-से खिसका देती मेरा तो भगवान में प्रेम हो गया । अब तो मक्खन-मिश्री क्या, भगवान का नाम हजार मक्खन मिश्रियों से भी ज्यादा मधुर होने लग गया ।"

माँ महँगीबा ध्दारा अपने लाडले पुत्र आसुमल की चित्तरूपी भूमि में बोये गये वे प्रभुप्रीति, प्रभुरस, के बीज एक दिन विशाल वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गये । सद्गुरु भगवत्पाद स्वामी श्री लीलाशाहजी की पूर्ण कृपा प्राप्त कर आसुमल ब्रह्मानंद की मस्ती में रमण करनेवाले ब्रह्मवेत्ता संत श्री आशारामजी बापू हो गये ।

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