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माँ के संस्कारों से ......

 

संतान पर माता-पिता के संग और गुण-अवगुण का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है । पूरे परिवार में माँ के जीवन और उसकी शिक्षा का संतान पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है । हर माँ 'आदर्श माँ कैसे बनें ?' इसकी शिक्षा पूज्य बापू जी जैसे ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के सत्संग आदि के माध्यम से पा सकती है और अपनी संतान को सुसंस्कार देकर उसे सर्वोत्तम लक्ष्य तक पहुँचाने में बहुत सहायक हो सकती है । इस बात को समझने वाली और उत्तम संस्कारों से सम्पन्न थीं माता भुवनेश्वरी देवी ।

सुसंस्कार सिंचन हेतु माता भुवनेश्वरी देवी बचपन में अपने पुत्र नरेन्द्र को रोचक एवं रसमय प्रेरक कहानियाँ व भगवान, संतो-महापुरुषों के प्रेरणादायी जीवन-चरित्र आदि सुनातीं । वे जब भगवान श्रीराम जी के कार्यों में अपने जीवन को अर्पित कर देने वाले वीर-भक्त हनुमान जी के अलौकिक कार्यों की कथाएँ सुनातीं तो नरेन्द्र को बहुत ही अच्छा लगता । माता से उन्होंने सुना कि 'हनुमान जी अमर हैं, वे अभी भी जीवित है ।' तब से हनुमान जी के दर्शन हेतु नरेन्द्र के प्राण छटपटाने लगे । एक दिन नरेन्द्र भगवत्कथा सुनने गये । कथाकार पंडित जी नाना प्रकार की अलंकारिक भाषा में हास्य रस मिला के हनुमान जी के चरित्र का वर्णन कर रहे थे । नरेन्द्र धीरे-धीरे उनके पास जा पहुँचे । पूछाः "पंडित जी ! आपने जो कहा कि हनुमान जी केला खाना पसंद करते हैं और केले के बगीचे में ही रहते हैं तो क्या मैं वहाँ जाकर उनके दर्शन पा सकूँगा ?"

बालक में हनुमान जी से मिलने की कितनी प्यास थी, कितनी जिज्ञासा थी इस बात की गम्भीरता को पंडित जी समझ न सके । उनको हँसते हुए कहाः "हाँ बेटा ! केले के बगीचे में ढूँढने पर तुम हनुमान जी को पा सकते हो ।"

बालक घर न लौटकर सीधे बगीचे में जा पहुँचा । वहाँ केले के एक पेड़ के नीचे बैठ गया और हनुमान जी की प्रतीक्षा करने लगा । काफी समय बीत गया पर हनुमान जी नहीं आये । अधिक रात बीतने पर निराश हो बालक घर लौट आया । माता को सारी घटना सुनाकर दुःखी मन से पूछाः "माँ ! हनुमान जी आज मुझसे मिलने क्यों नहीं आये ?" बालक के विश्वास के मूल पर आघात करना बुद्धिमती माता ने उचित न समझा । उसके मुखमंडल को चूमकर माँ ने कहाः "बेटा ! तू दुःखी न हो, हो सकता है आज हनुमान जी श्रीराम जी के काम से कहीं दूसरी जगह गये हों, किसी और दिन मिलेंगे ।" आशामुग्ध बालक का चित्त शांत हुआ, उसके मुख पर फिर से हँसी आ गयी । माँ के समझदारीपूर्ण उत्तर से बालक के मन से हनुमान जी के प्रति गम्भीर श्रद्धा का भाव लुप्त नहीं हुआ, जिससे आगे चलकर हनुमान जी के ब्रह्मचर्य-व्रत से प्रेरणा पा के उसने भी ब्रह्मचर्य-व्रत धारण किया ।

बाल मन में देव-दर्शन की उठी इस अभिलाषा को, श्रद्धा की इस छोटी सी चिनगारी को देवी स्वरूपा माँ ने ऐसा तो प्रज्वलित किया कि वह शीघ्र ही ईश्वर-दर्शन की तड़परूपी धधकती विरहाग्नि बन गयी । और नरेन्द्र की यह तीव्र तड़प सदगुरु रामकृष्ण परमहंस जी के चरणों में पहुँचकर पूरी हुई । सदगुरु की कृपा ने नरेन्द्र को स्वामी विवेकानंद बना दिया, देह में रहे हुए विदेही आत्मा का साक्षात्कार कराके परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित कर दिया ।

 

माँ का ऋण कैसा ?

 

स्वामी विवेकानंद को किसी युवक ने कहाः "महाराज ! कहते हैं कि माँ का ऋण चुकाना कठिन होता है । ऐसा तो क्या है माँ का ऋण ?"

विवेकानंदजीः "इस प्रश्न का उत्तर प्रायोगिक चाहते हो ?"

"हाँ महाराज !"

"थोड़ी हिम्मत करो, यह जो पत्थर पड़ा है, इसको अपने पेट पर बाँध लो और दफ्तर में काम करने जाओ । शाम को मिलना ।"

पेट पर ढाई-तीन किलो का पत्थऱ बँधा हो और कामकाज करे तो हालत क्या होगी ? आजमाना हो तो आजमा के देख लेना । नहीं तो मान लो, क्या हालत होती है ।

वह थका-माँदा शाम को लौटा । विवेकानंद जी के पास जाकर बोलाः "माँ का ऋण कैसा ? इसका जवाब पाने में तो बड़ी मुसीबत उठानी पड़ी । अब बताने की कृपा करें कि माँ का ऋण कैसा होता है ?"

"यह पत्थर तूने कब से बाँधा है ?"

"आज सुबह से ।"

"एक ही दिन हुआ, ज्यादा तो नहीं हुए न ?"

"नहीं ।"

"तू एक दिन में ही तौबा पुकार गया । जो महीनों-महीनों तेरा बोझ लेकर घूमती थीं, उसने कितना सहा होगा ! उसने तो कभी 'ना' नहीं कहा । अब इससे ज्यादा प्रायोगिक क्या बताऊँ तुझे ?"

 

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