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पतिव्रता के लक्षण

 

पतिव्रता, साध्वी और सती स्त्री वही है, जो सर्वदा अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर अपने पतिपर निर्मल प्रीति रखती है तथा पति के इच्छानुसार चलकर उसकी आज्ञा का पालन करती है । अर्थात् जो तन, मन और वचन से पति की सेवा के सिवा दूसरी कुछ भी इच्छा नहीं रखती । पति को ही अपने सुख-दुःख का एकमात्र साथी समझती है । बिना कार्य घरके बाहर नहीं जाती । सास- ससुरको सगे माता-पिता के सदृश समझकर सदा सेवा-भक्ति करती है । ननद को सगी बहन के समान और देवर को भातृवत् समझती है । पति के सोने के पीछे सोती है । उठने के पहले उठकर स्वच्छतापूर्वक घर का तमाम कार्य करती है । पति को नियमपूर्वक प्रथम भोजन कराकर फिर स्वयं खाती है । घर के सारे काम करके अध्ययन में मन लगाती है ।

पति प्रिय आत्मीय-स्वजनों का सम्मान करती है । नीचे दृष्टि रखकर घर का काम-काज सुचारू रूप से करती है । बाहरी लोगों के साथ व्यर्थ बात-चीत नहीं करती । किसी के साथ क्रोध से अथवा स्वभाव से भी ऊँचे स्वर से नहीं बोलती । पति से छिपाकर कुछ भी नहीं रखती । सत्शास्त्र का उपदेश श्रवण करके उसी के अनुसार बर्ताव करती है । पति को धर्म-सम्बन्धी तथा व्यवहार-सम्बन्धी कार्यों में उत्साह और साहस देकर तन-मन और वचन से सहायता करती है ।

संतान का प्रेम से पालन-पोषण करती हुई उसे धीर, वीर, गम्भीर, धार्मिक और सर्वगुणसम्पन्न विद्वान बनाने का सर्वदा प्रयत्न करती है । उसे अशुभ कार्यों में प्रवृत्त नहीं होने देती । पति की दी हुई वस्तु को भली-भाँति संभालकर रखती है । यदि कोई दुष्ट पुरुष बुरी दृष्टी से उसकी ओर देखे, मधुर वचनों से रीझावे, अथवा उसे कभी आवश्यक कार्यवश मनुष्यों की भीड़ में जाना पडे़ और उस समय किसी पुरुष का स्पर्श हो जाय, तो इन अवस्थाओं में मन में जरा भी विकार नहीं लाती । पर पुरुष के सामने दृष्टि स्थिर करके एक दृष्टि से नहीं देखती । किंतु कार्यवश कदाचित् सामने देखने की आवश्यकता होती है तो भाई और पिता के समान समझकर देखती है । देव-दर्शन आदि के बहाने पुरुषों की भीड़ में धक्के न खाकर घर में ही प्रेमपूर्वक ईश्वरभक्ति करती है ।

पति कैसा भी हो, उसीको देवतुल्य जानकर सदा प्रसन्न रहती है । पति के सिवा दूसरे किसी की भी गरज नहीं रखती । किसी मनुष्य के द्वारा किसी प्रकार का बड़े-से-बड़ा लोभ दिखलाये जाने पर भी अपने मन को विचलित नहीं होने देती । फिर वह मनुष्य चाहे देव-गन्धर्व के समान परम सुन्दर और महान धन सम्पन्न क्यों न हो । पतिव्रता स्त्री किसी बात के किसी भी प्रलोभन में न फँसकर दृष्ट पुरुषों को धिक्कारती और उनको दूर कर देती है । पति के सिवा किसी को नहीं भजती । किसी भी पुरुष का स्पर्श न हो जाय, इसका ध्यान रखती है । मर्यादा, शील और लज्जा की रक्षा हो, ऐसा वस्त्र पहनती है । पिंडली, जंघा, पेट, वक्ष:स्थल आदि शरीर के सारे अंग अच्छी तरह ढ़ंके रहें इस प्रकार के वस्त्रों को धारण करती है । नग्न होकर स्नान नहीं करती ।

सदा हर्षित वदन रहती है । धीमी चाल से चलती है । बजनेवाले गहने नहीं पहनती । कभी जोर से नहीं हँसती । अन्यान्य स्त्री-पुरुषोंकी विलास-चेष्टा को कभी नहीं देखती । सदा सौभाग्य दर्शक साधारण शृंगार रखती है । शरीर को बाहरी हीरे- मोती या स्वर्ण के अच्छे आभूषणों के बदले आदर्श सदगुणों से सजाने की इच्छा और चेष्टा करती है । शरीर को क्षणभंगुर मानकर परलोक का विचारकर उत्तम दान-पुण्य करके सत्कीर्ति का संपादन करती है । सदा शील की सावधानी से रक्षा करती है । सत्य बोलती है । कभी चोरी नहीं करती । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और तृष्णा को शत्रु के समान समझकर यथासाध्य इनका त्याग करती है । संतोष, समता, सहनशीलता, त्याग, विनय, अहिंसा, सत्य और क्षमा आदि सद्गुणों से मित्र के समान प्रेम करती है । पति के द्वारा जो कुछ मिलता है, उसी में निरन्तर आनन्द मानती है । विद्या और विनय आदि गुणों को ग्रहण करती है । उदार, चतुर और परोपकारपरायण रहती है । धर्म, नीति, सदव्यवहार और कला-कौशल की शिक्षा स्वयं प्राप्त कर अपनी संतान को सिखाती तथा श्रेष्ठ उपदेश देकर सन्मार्ग में लाने का प्रयत्न करती है । किसीको दुःख हो, ऐसा बर्ताव कभी नहीं करती । अपने परिवार तथा अन्य जनों के साथ लड़-झगड़कर क्लेश उत्पन्न नहीं करती । हर्ष-शोक और सुख-दुःख में समान रहती है । पति की आज्ञा लेकर सौभाग्यवर्धक व्रत-नियम आदि धर्मकार्य करती है । धर्मपर पूर्ण श्रद्धा रखती है । जेठ को ससुर और जेठानी को सास के तुल्य देखती है । उनकी संतान को अपनी ही संतान के समान प्रिय समझती है । शास्त्रों को पढ़ती और सुनती है । किसी की निन्‍दा नहीं करती । नीच, कलन्कित, पतिद्रोहिणी और कलहा स्त्रियों की संगति कभी भूलकर भी नहीं करती । ऐसी दुष्ट आत्माओं के पास खड़ी रहना तथा बैठना भी नहीं चाहती । सद्गुणवती और सुपात्र स्त्रियों की ही संगति करती है । सब दुर्गुणों से दूर रह सद्गुणों को ग्रहण कर दूसरी बहनों को अपने समान सद्गुणवती बनाने की विनय तथा प्रेमपूर्वक चेष्टा रखती है ।

किसीका अपमान नहीं करती, न कटु वचन बोलती, न व्यर्थ बकवाद करती और न ज्यादा बोलचाल ही करती है । पति का कभी स्वयं अपमान नहीं करती और न दूसरों के द्वारा किये हुए उसके अपमान को सहन कर सकती है । वैद्य, वृद्ध और सदगुरु से भी आवश्यकता होने पर ही मर्यादा से बोलती है । पीहर में अधिक समय नहीं रहती । इस असार संसार में यह मनुष्य-जन्म किस प्रकार सार्थक हो, इस बात का विचार रात-दिन करती है और विचार के द्वारा निश्चित किये हुए सत्य मार्गपर स्थित रहकर ही जगत के सब बर्ताव करती है । विघ्नों को और नाना प्रकार के संकटों को सहकर भी नेक कार्य को कभी नहीं छोड़ती - इत्यादि शुभ लक्षण सती या पतिव्रता स्त्रीमें स्वाभाविक होते हैं ।

उपर्युक्त लक्षणों को धारण करनेवाली ब्राह्मी, सुन्दरी, चन्दनबाला, राजीमति, द्रौपदी, कौशल्या, मृगावती, सुलभा, सीता, सुभद्रा, शिवा, कुन्ती, शीलवती दमयन्ती, पुष्पचूला और पद्मावती आदि ऐसी अनेक स्त्रियाँ प्राचीन काल में हो चुकी हैं, जिन्होंने अपने सत्यव्रत को अखण्डित रखने के लिये अनेक प्रकार की भयानक आपत्तियों का सामना किया । इसीलिये वे सतियाँ इस दो अक्षरों के पूज्य पद को प्राप्त हुईं । 'सती' इस दो अक्षरों की पूज्य पदवि को प्राप्त कर लेना सहज नहीं हैं । यह तलवार की धार पर चलने के समान अति कठिन काम है । जिसके पूर्वकृत पुण्यों का संचय होता है और जिसका वर्तमान जीवन सत्-चिन्तन तथा सत्-कर्मशील होता है, उसको यह पद सहज-स्वाभाविक रीति से सुखपूर्वक प्राप्त हो जाता है ।

देखिये ! जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाना - यही पुरुष तथा स्त्री का मुख्य कर्तव्य है । इस प्रधान कर्तव्य को इन्द्रियों के तुच्छ सुख में ही अपने जन्म-जीवन को गवाँ देना बहुत बड़ी मूर्खता और महान हानि है ! इसलिये प्यारी बहनो ! तुम अपने स्त्री-धर्म को समझो; समझकर पालन करो और दुर्लभ सतीत्व को प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक करो । यही तुम्हारा कर्तव्य तथा परम धर्म है । इसी से तुमको इस लोक तथा परलोक में महान सुख-शान्ति की निश्चित प्राप्ति होगी ।

    

         

 

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