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ऐसे रहे परिवार में....

 

आपके त्याग में, प्रेम में, आपकी निरअहंकारिता में सामनेवाले को सुधारने की ताकत है । एक ऊँची स्थिति की कन्या थी । उसने गुरुमंत्र लिया था पर एक बदमाश शराबी के साथ उसकी शादी हो गयी । पति दारू पीता था और जो दारू पीता है उसकी बुद्धि का क्या ठिकाना ! उसकी कई प्रेमिकाएँ भी थीं । सारे ऐब उसमें थे लेकिन उस साध्वी कन्या ने सोचा कि 'धीरज सबका मित्र है ।' उसका पति मांस खाता और वह बेचारी साध्वी थी । वह पति को मांस पकाकर देती, फिर नहा-धोकर अपने लिए भोजन बनाती । कैसे रही होगी वह कन्या ! जैसे दाँतो के बीच जीभ रहे, ऐसे ही वह रही ।

एक दिन उसका पति बीमार पड़ा । उसने भोजन के बारे में पूछा : "तुमने खाया ?"

वह बोली : "नहीं, पति परमात्मा हैं, आप खा लें फिर मैं खाऊँगी ।"

"नहीं ! आज तो मेरा मांस नहीं बना था तो तुमने... !"

"पहले आप खाओ, बाद में मैं बनाके खा लूँगी ।"

"मैं तुम्हारी सेवा पर मैं खुश हूँ । तुम जो माँगो मैं देता हूँ । वचन माँग लो ।"

"बस आप दारू पीना छोड़ दो  ।"

पीना भी छोड़ दिया, खाना भी छोड़ दिया । वेश्याओं और प्रेमिकाओं के पास जाना भी छोड़ दिखा । वह देवता बन गया । पहले उसका जीवन कैसा था लेकिन उनकी पत्नी ने उसके जीवन की पटरियाँ ही बदल दीं !

पत्नी यह नहीं चाहे कि 'मेरा हक है, पति मेरे कहने में चले ।' और पति यह न चाहे कि 'पत्नी मेरी गुलाम होकर रहे ।' नहीं, दोनों अपनी वासना छोड़े और एक-दूसरे के अनुकूल हों तो घर स्वर्ग हो जायेगा ।

इसके लिए क्या चाहिए ? इसके लिए बल चाहिए । 'धैर्यबल, बुद्धिबल, ज्ञानबल.... सब बल जहाँ से आते हैं वे परमात्मा मेरे हैं, मैं परमात्मा का हूँ ।' - ऐसा चिंतन करके ५-१० मिनट 'ॐ... ॐ... 'का उच्चारण करें । आसन पर बैठकर ऐसा करोगे तो जो ऊर्जा बनेगी उसको अर्थिंग नहीं मिलेगी, वह ऊर्जा आपके पास रहेगी । फिर गुरु को, भगवान को, आकाश को एकटक देखकर लम्बा श्वास लो, रोके रखो और 'मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं' - यह पक्का निश्चय करो । ऐसा २ से ३ बार रोज करो तो आपकी बुद्धि में भगवान का समत्वयोग आयेगा । आपके-सोच विचार में भगवान की सत्ता का सहयोग आ जायेगा । जरा-जरा सी बातों में डरने की और सुखी-दुःखी होने की बेवकूफी कम हो जायेगी । जो जितना ज्यादा बेवकूफ, उतना ज्यादा सुखी-दुःखी और बेवकूफ नहीं है तो सुखी-दुःखी भी नहीं है, सम है ।

'पति अनुकूल नहीं है, अनुकूल हो जाय'- ऐसा आग्रह नहीं रखना चाहिए । दूसरा अनुकूल हो यह हमारे हाथ की बात नहीं है लेकिन हम उसके अनुकूल हो सकते हैं, यह हमारी तपस्या हो जायेगी ।

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