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दाम्पत्य प्रेम का आदर्श

 

महात्मा गाँधी और उनकी पत्नी कस्तूरबा का दाम्पत्य प्रेम विषय-वासना से प्रेरित न होकर एक आदर्श, विशुद्ध, निष्कपट प्रेम का ज्वल्यमान उदाहरण था ।

एक बार कस्तूरबा को कोई बीमारी हो गयी । चिकित्सक ने उनसे कहा कि "आप नमक छोड़ दीजिए ताकि आपका रोग ठीक हो जाय ।"

लेकिन माँ को नमक छोड़ना सँभव न लगा । उन्होंने गाँधी जी से कहाः "मैं नमक नहीं छोड़ सकती । बिना नमक के साग-दाल कैसे खाये जा सकते हैं ?"

गाँधीजी ने कहाः "अच्छा, तो हम 20 दिन तक नमक छोड़ते हैं ।"

माँ समझ गयीं कि ये बिना नमक का भोजन करेंगे तो मुझे भी बिना नमक का भोजन करना पड़ेगा । माँ को बिना नमक का भोजन करने में गाँधी जी का साथ मिल गया और उनका मनोबल बढ़ गया । पत्नी का मनोबल बढ़ाने हेतु गाँधी जी ने अपनी सुविधा की परवाह नहीं की ।

 

ʹ....तो मैं नहीं खाऊँगीʹ

 

कस्तूरबा भोजन बनाने में बड़ी कुशल थीं लेकिन जब से गाँधी जी ने अपने जीवन में अस्वाद-व्रत को स्थान दिया था, तब से उनकी यह कला उतनी काम में नहीं आती थी । फिर भी वे कभी-कभी कोई स्वादिष्ट व्यंजन बना ही लेती थीं । उन्हें अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाकर खाने और दूसरों को  प्रेम से खिलाने में बड़ा आनंद आता था ।

एक दिन उन्होंने मनु बहन से पूरन-पूरी (एक विशेष प्रकार की मीठी रोटी) बनाने को कहा और बोलीं- "आज तो मैं भी पूरन-पूरी खाऊँगी । तू जाकर बापूजी (गाँधी जी) से पूछ आ कि वे खायेंगे ?"

माँ की तबीयत ढीली तो थी ही । अगर वे पूरन-पूरी जैसी भारी चीज खातीं तो उससे उनके हृदय की धड़कन बढ़ जाने का डर था । इसलिए जब मनु बहन गाँधी जी से पूछने गयीं, तब गाँधी जी ने माँ का ख्याल करके कहाः "अगर कस्तूरबा पूरन-पूरी न खाये तो मैं खाऊँगा ।"

माँ को निश्चय करने में एक क्षण की भी देर न लगी । वे बोलीं- "अच्छा, तो मैं नहीं खाऊँगी ।"

इसके बाद कस्तूरबा ने मनु बहन के पास बैठकर गाँधी जी और दूसरे सब लोगों के लिए पूरन-पूरियाँ बनवायीं और सबको प्रेम से खिलायीं लेकिन स्वयं चखी तक नहीं ।

ʹमेरी पत्नी मेरे लिये क्या सोचेगी ?ʹ ऐसा न सोचकर उनके हित की भावना को प्रधानता देने वाले गाँधी जी और ʹमेरे पति मेरे हित की भावना से ही ऐसा कर रहे हैं ।ʹ इस प्रकार का विवेक तथा अपने पति के प्रति विशुद्ध, उत्कट प्रेम रखने वाली त्याग की प्रतिमूर्ति कस्तूरबा का दाम्पत्य जीवन सभी गृहस्थों के लिए एक उत्तम आदर्श प्रस्तुत करता है ।

पैसा और प्रसिद्धि के पीछे समाज को पथभ्रष्ट करने का जघन्य अपराध कर रहे फिल्मी अभिनेताओं व अभिनेत्रियों की नकल करके अपना दाम्पत्य जीवन तबाह करने की मूर्खता करने के बजाय हमारे भारतवासी उतना ही समय संत-महात्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में लगायें तो कितना अच्छा होगा !

 

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