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अथाह शक्ति की धनीः तपस्विनी शाण्डालिनी
अथाह शक्ति की धनीः तपस्विनी शाण्डालिनी

 

शाण्डालिनी का रूप-लावण्य और सौन्दर्य देखकर गालव ऋषि और गरूड़जी मोहित हो गये । 'ऐसी सुन्दरी और इतनी तेजस्विनी ! वह भी धरती पर तपस्यारत ! यह स्त्री तो भगवान विष्णु की भार्या होने के योग्य है....' ऐसा सोचकर उन्होंने शाण्डालिनी के आगे यह प्रस्ताव रखा ।

शाण्डालिनीः "नहीं नहीं, मुझे तो ब्रह्मचर्य का पालन करना है ।"

यह कहकर शाण्डालिनी पुनः तपस्यारत हो गयी और अपने शुद्ध-बुद्ध स्वरूप की ओर यात्रा करने लगी ।

गालवजी और गरुड़जी का यह देखकर पुनः विचारने लगे कि 'अप्सराओं को भी मात कर देने वाले सौन्दर्य की स्वामिनी यह शाण्डालिनी अगर तपस्या में ही रत रही तो जोगन बन जायेगी और हम लोगों की बात मानेगी नहीं । अतः इसे अभी उठाकर ले चलें और भगवान विष्णु के साथ जबरन इसकी शादी करवा दें ।'

एक प्रभात को दोनों शाण्डालिनी को ले जाने के लिए आये । शाण्डालिनी की दृष्टि जैसे ही उन दोनों पर पड़ी तो वह समझ गयी कि 'अपने लिए तो नहीं, किंतु अपनी इच्छा पूरी करने के लिए इनकी नीयत बुरी हुई है । जब मेरी कोई इच्छा नहीं है तो मैं किसी की इच्छा के आगे क्यों दबूँ ? मुझे तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना है किंतु ये दोनों मुझे जबरन गृहस्थी में घसीटना चाहते हैं । मुझे विष्णु की पत्नि नहीं बनना, वरन् मुझे तो निज स्वभाव को पाना है ।'

गरुड़जी तो बलवान थे ही, गालवजी भी कम नहीं थे । किंतु शाण्डालिनी की निःस्वार्थ सेवा, निःस्वार्थ परमात्मा में विश्रान्ति की यात्रा ने उसको इतना तो सामर्थ्यवान बना दिया था कि उसके द्वारा पानी के छींटे मार कर यह कहते ही कि 'गालव ! तुम गल जाओ और गालव को सहयोग देने वाले गरुड़ ! तुम भी गल जाओ ।' दोनों को महसूस होने लगा कि उनकी शक्ति क्षीण हो रही है । दोनों भीतर-ही-भीतर गलने लगे ।

फिर दोनों ने बड़ा प्रायश्चित किया और क्षमायाचना की, तब भारत की उस दिव्य कन्या शाण्डालिनी ने उन्हें माफ किया और पूर्ववत् कर दिया । उसी के तप के प्रभाव से 'गलतेश्वर तीर्थ' बना है ।

हे भारत की देवियो ! उठो.... जागो । अपनी आर्य नारियों की महानता को, अपने अतीत के गौरव को याद करो । तुममें अथाह सामर्थ्य है, उसे पहचानो । सत्संग, जप, परमात्म-ध्यान से अपनी छुपी हुई शक्तियों को जाग्रत करो ।

जीवनशक्ति का ह्रास करने वाली पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से बचकर तन-मन को दूषित करने वाली फैशनपरस्ती एवं विलासिता से बचकर अपने जीवन को जीवनदाता के पथ पर अग्रसर करो । अगर ऐसा कर सको तो वह दिन दूर नहीं, जब विश्व तुम्हारे दिव्य चरित्र का गान कर अपने को कृतार्थ मानेगा ।

 

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