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आर्त भक्त द्रौपदी
आर्त भक्त द्रौपदी

 

ईर्ष्या-द्वेष और अति धन-संग्रह से मनुष्य अशांत होता है । ईर्ष्या-द्वेष की जगह पर क्षमा और सत्प्रवृत्ति का हिस्सा बढ़ा दिया जाय तो कितना अच्छा !

दुर्योधन ईर्ष्यालु था, द्वेषी था । उसने तीन महीने तक दुर्वासा ऋषि की भली प्रकार से सेवा की, उनके शिष्यों की भी सेवा की । दुर्योधन की सेवा से दुर्वासा ऋषि प्रसन्न हो गये और बोलेः "माँग ले वत्स ! जो माँगना चाहे माँग ले ।"

जो ईर्ष्या और द्वेष के शिकंजे में आ जाता है, उसका विवेक उसे साथ नहीं देता लेकिन जो ईर्ष्या-द्वेष रहित होता है उसका विवेक सजग रहता है वह शांत होकर विचार या निर्णय करता है । ऐसा व्यक्ति सफल होता है और सफलता के अहं में गर्क नहीं होता । कभी असफल भी हो गया तो विफलता के विवाद में नहीं डूबता । दुष्ट दुर्योधन ने ईर्ष्या एवं द्वेष के वशीभूत होकर कहाः

"मेरे भाई पाण्डव वन में दर-दर भटक रहे हैं । उनकी इच्छा है कि आप अपने हजार शिष्यों के साथ उनके अतिथी हो जायें । अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे भाइयों की इच्छा पूरी करें लेकिन आप उसी वक्त उनके पास पहुँचियेगा । जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो ।"

दुर्योधन जानता था कि "भगवान सूर्य ने पाण्डवों को अक्षयपात्र दिया है । उसमें से तब तक भोजन-सामग्री मिलती रहती है, जब तक द्रौपदी भोजन न कर ले । द्रौपदी भोजन करके पात्र को धोकर रख दे फिर उस दिन उसमें से भोजन नहीं निकलेगा । अतः दोपहर के बाद जब दुर्वासाजी उनके पास पहुँचेंगे, तब भोजन न मिलने से कुपित हो जायेंगे और पाण्डवों को शाप दे देंगे । इससे पाण्डव वंश का सर्वनाश हो जायेगा ।"

इस ईर्ष्या और द्वेष से प्रेरित होकर दुर्योधन ने दुर्वासाजी की प्रसन्नता का लाभ उठाना चाहा ।

दुर्वासा ऋषि मध्याह्न के समय जा पहुँचे पाण्डवों के पास । युधिष्ठिर आदि पाण्डव एवं द्रौपदी दुर्वासाजी को शिष्यों समेत अतिथि के रूप में आया हुआ देखकर चिन्तित हो गये । फिर भी बोलेः "विराजिये महर्षि ! आपके भोजन की व्यवस्था करते हैं ।"

अंतर्यामी परमात्मा सबका सहायक है, सच्चे का मददगार है । दुर्वासाजी बोलेः "ठहरो, ठहरो.... भोजन बाद में करेंगे । अभी तो यात्रा की थकान मिटाने के लिए स्नान करने जा रहा हूँ ।"

इधर द्रौपदी चिन्तित हो उठी कि अब अक्षयपात्र से कुछ न मिल सकेगा और इन साधुओं को भूखा कैसे भेजें ? उनमें भी दुर्वासा ऋषि को ! वह पुकार उठीः "हे केशव ! हे माधव ! हे भक्तवत्सल !! अब मैं तुम्हारी शरण में हूँ...." शांत चित्त एवं पवित्र हृदय से द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का चिन्तन किया । भगवान श्रीकृष्ण आये और बोलेः "द्रौपदी ! कुछ खाने को तो दो !"

द्रौपदीः "केशव ! मैंने तो पात्र को धोकर रख दिया है ।"

श्री कृष्णः "नहीं, नहीं... लाओ तो सही ! उसमें जरूर कुछ होगा ।"

द्रौपदी ने पात्र लाकर रख दिया तो दैवयोग से उसमें तांदुल के साग का एक पत्ता बच गया था । विश्वात्मा श्रीकृष्ण ने संकल्प करके उस तांदुल के साग का पत्ता खाया और तृप्ति का अनुभव किया तो उन महात्माओं को भी तृप्ति का अनुभव हुआ वे कहने लगे किः "अब तो हम तृप्त हो चुके हैं, वहाँ जाकर क्या खायेंगे ? युधिष्ठिर को क्या मुँह दिखायेंगे ?"

शातं चित्त से की हुई प्रार्थना अवश्य फलती है । ईर्ष्यालु एवं द्वेषी चित्त से तो किया-कराया भी चौपट हो जाता है जबकि नम्र और शांत चित्त से तो चौपट हुई बाजी भी जीत में बदल जाती है और हृदय धन्यता से भर जाता है ।

 

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