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समृद्धि और सफलता चाहिए तो....
समृद्धि और सफलता चाहिए तो....

 

तीन बूढ़े साधु किसी द्वार पर पहुँचे । बुजुर्ग साधु देखने में बड़े प्रभावशाली थे । तीनों ने अलख जगायी ।

“अलख निरंजन !”

“नारायण-नारायण !”

“जय-जय सियाराम !”

एक शैव थे, एक वैष्णव थे और एक रामानंदी थे । तीनों साधुओं की आपस में बड़ी मित्रता थी | भिक्षा माँगने जायें तो सब साथ में जायें ।

गृहिणी आयी, बोली : “बाबा ! आज बारस का दिन है और संत मेरे द्वार पर आये हैं । एकादशी का व्रत अभी खोला है । आप तीनों अंदर पधारें । मैं आपको भोजन कराके धन्यता का एहसास करूँगी । भोजन थोड़ा ज्यादा ही बन गया है । आप संकोच न कीजिये, अंदर पधारिये ।”

अलख निरंजनवाले महात्मा ने कहा : “हम तीनों तो एक साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकते । हमने आपस में व्रत लिया है कि 'किसीको भी कोई बैठ के भोजन करने का आमंत्रण देगा तो एक ही भोजन करेगा, शेष दो लोग भिक्षा माँगेंगे।' अब हम तीनों में से किसी एक को बिठाकर आप करने का आमंत्रण दे सकती हैं । ये महात्मा हैं प्रेमजी, दूसरे महात्मा हैं सफलानंद और मैं हूँ समृद्धिदास |”

गृहिणी बोली : “बाबा ! तनिक ठहरिये । मैं जरा अपने पति-परमात्मा से सलाह करके आती हूँ ।'' जो नारी अपने पति को भोगदृष्टि से नहीं भगवददृष्टि से देखती है, उसमें सतीत्व का प्रभाव आ जाता है। पति चाहे कैसा भी हों लेकिन उस नारी की ऊँची दृष्टि का फल उसको मिलता है ।

वह पति से मशवरा करके आयी ।

बोली : “महाराज ! आप तीनों चलते तो अच्छा था ।”

साधु : “नहीं । जल्दी करो, हम लोगों को देर हो रही है | हम तीनों में से एक को आमंत्रित करना होगा ।”

बोली : “'प्रेमजी महाराज ! पधारिये ।" वें महाराज दो कदम आगे आये तो सफलानंद और समृद्धिदास दोनों पीछे-पीछे आ गये |

गृहिणी : “महाराज ! आपने तो कहा था कि कोई एक आ सकते हैं । आप तो तीनों आ रहे हैं !"

साधु : “समृद्धिदास अथवा सफलानंद को बुलाती तो दो अन्य जगह जाते लेकिन जहाँ प्रेमानंद हैं, प्रेमजी हैं वहाँ तो समृदधि और सफलता स्वाभाविक होती है । जहाँ कुटूम्ब में प्रेम है, परमात्मा से प्रेम है, भक्ति का रस है वहाँ समृद्धि और सफलता छाया की तरह जाती है । जहाँ परमात्म-प्रेम नहीं है, भगवान की भक्ति का रस नहीं है वहाँ समृद्धि और सफलता दिखावटी होती है तथा अंदर से कंगालियत बनी रहती है ।

 

 

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