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Kavya Gunjan - Sadguru Stuti

Kavya Gunjan - Sadguru Stuti

               सद्गुरु - स्तुति


हे सद्गुरु तुम परम हितैषी, तुमसे ही कल्याण हमारा,

तुम्हें न पाकर व्यर्थ चला जाता , मानव का यह जीवन सारा ||

परम सत्य, हे नित्य युक्त, हे शुद्ध बुद्ध, हे मुक्त महानतम |

मन दे पाये जो तुमको ही, उसका सफल हुआ मानव तन |

देव तुम्हारे दर्शन करके, लग जाता तुममें जिसका मन |

तुम्हें छोड़कर कहीं न जाता, तुम्हीं दिखते हो प्रियतम धन |

बुद्धियोग जब तुम देते हो, तब होता है जीवन दर्शन |

ज्ञानदृष्टि तुमसे ही खुलती, तभी सुलभ होते आनंदघन |

कितनों ने ही सीख लिया, मरकर जीने का मन्त्र तुम्हारा ||

हे सद्गुरु तुम परम हितैषी ..............

नित्य अनेकों मुरझाये मुख, खिलते देखा तुमको पाकर |

सदा पीड़ितों की पुकार पर, रहे दौड़ते कष्ट उठाकर |

जो न कहीं सुख देख मिला वह, देखा श्रीचरणों में आकर |

जो न कभी हो सका वही, हो गया तुम्हारा ध्यान लगाकर |

अभय कर दिया उसको जिसने, कभी हृदय से तुम्हें पुकारा ||

हे सद्गुरु ............

तुमको मैंने दीनों-दलितों की, कुटिया में जाते देखा |

अपनी दिव्य शक्ति से उनके, भीषण कष्ट मिटाते देखा |

कहीं अश्रु से गीली पलकें, स्वामिन तुम्हें सुखाते देखा |

जो कि तुम्हें करना था उसमें, कभी न देर लगाते देखा |

तुमने उसकी सुनी दयामय, जिसको सबने ही दुत्कारा ||

हे सद्गुरु तुम परम हितैषी ............... 



 

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