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Guru Purnima - A day to express our gratitude towards Gurudev

Guru Purnima - A day to express our gratitude towards Gurudev

       सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकटाने का पर्व : गुरुपूर्णिमा 

गुरुवाक्य का कर अनुसरण, विश्वास श्रद्धायुक्त हो |
बतलाय है जो शास्त्र, कर आचार संशयमुक्त हो ||
जो जो बताते शास्त्र गुरु, उपदेश सर्व यथार्थ हो |
संशय न उसमें कर कभी, यदि चाहता परमार्थ है ||

आषाढ़ी पूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा कहा जाता है | वेदव्यासजी ने जीवों के उद्धार हेतु, छोटे-से-छोटे व्यक्ति का भी उत्थान कैसे हो, महान-से-महान विद्वान को भी लाभ कैसे हो – इसके लिए वेद का विस्तार किया | इस व्यासपूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा भी कहा जाता है | 

‘गु’ माने अन्धकार, ‘रु’ माने प्रकाश | अविद्या, अन्धकार में जन्मों से भटकता हुआ, माताओं के गर्भों में यात्रा करता हुआ यह जीव आत्मप्रकाश की तरफ चले इसलिए इसको ऊपर उठाने के लिए गुरुओं की जरूरत पडती है | अन्धकार हटाकर प्रकाश की ज्योति जगमगानेवाले जो श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ आत्मारामी महापुरुष अपने-आपमें तृप्त हुए हैं, समाज व्यासपूर्णिमा के दिन ऐसे महापुरुषों का आदर-सत्कार करता है | उनके गुण अपने में लाने का संकल्प करता है | 

कैसे करें अपने प्यारे सदगुरुदेव का मानस-पूजन ?  

गुरु माने भारी, बड़ा, ऊँचा | गुरु शिखर ! तिनका थोड़े-से हवा के झोंके से हिलता है, पत्ते भी हिलते हैं, लेकिन पहाड़ नहीं डिगता | वैसे ही संसार की तू-तू, मैं-मैं, निंदा-स्तुति, सुख-दुःख में जिनका मन नहीं डिगता, ऐसे सदगुरु का सान्निध्य देनेवाली है गुरुपूर्णिमा | 

ऐसे ही हमारे प्यारे सद्गुरुदेव का कैसा पूजन करें ? समझ में नहीं आता फिर भी पूजन किये बिना रहा नहीं जाता | 

  मानस-पूजन विधि 

गुरुपूनम की सुबह उठें | नहा-धोकर थोडा-बहुत धूप, प्राणायाम आदि करके श्रीगुरुगीता का पाठ कर लें | फिर इस प्रकार मानसिक पूजन करें : 

‘मेरे गुरुदेव ! मन-ही-मन, मानसिक रूप से मैं आपको सप्ततीर्थों के जल से स्नान करा रहा हूँ | मेरे नाथ ! स्वच्छ वस्त्रों से आपका चिन्मय वपु (चिन्मय शरीर) पोंछ रहा / रही  हूँ | शुद्ध वस्त्र पहनाकर मैं आपको मन से ही तिलक करता / करती हूँ, स्वीकार कीजिये | मोगरा और गुलाब के पुष्पों की दो मालाएँ आपके वक्षस्थल में सुशोभित करता / करती  हूँ | आपने तो हृदयकमल विकसित करके उसकी सुवास हमारे हृदय तक पहुंचायी है लेकिन पुष्पों की सुवास आपके पावन तन तक पहुँचाते हैं, (वह भी हम अपने मन से), इसे स्वीकार कीजिये | साष्टांग दंडवत प्रणाम करके हम हमारा अहं आपके श्रीचरणों में धरते हैं |

हे मेरे गुरुदेव ! आज से मेरी देह, मेरा मन, मेरा जीवन मैं आपके दैवी कार्य के निमित्त पूरा नहीं, तो हररोज २ घंटा, ५ घंटा अर्पण करता हूँ, आप स्वीकार करना | भक्ति, निष्ठा और अपनी अनुभूति का दान देनेवाले देव ! बिना मांगें कोहिनूर का भी कोहिनूर आत्मप्रकाश देनेवाले हे मेरे परम हितैषी ! आपकी जय – जयकार हो |’ 

इस प्रकार पूजन तब तक बार बार करते रहें जब तक आपका पूजन गुरु तक, परमात्मा तक नहीं पहुंचें और पूजन पहुंचने का एहसास होगा, जब अष्टसात्विक भावों (स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, तल्लीन होना, अश्रु, प्रलय ) में से कोई- न – कोई भाव भगवत्कृपा, गुरुकृपा से आपके हृदय में प्रकट होगा | इस प्रकार गुरुपूर्णिमा के दिन आपको विशेष लाभ होगा, अनंत गुणा लाभ होगा |    

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