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नवरात्रि अनुष्ठान विधि

नवरात्रि अनुष्ठान विधि

                                                        मंत्रजाप-महिमा

                                                    मंत्रजाप मम दृढ़ बिस्वासा।

                                                    पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

                      

मंत्र एक ऐसा साधन है जो मानव की सोयी हुई चेतना को सुषुप्त शक्तियों को जगाकर उसे महान बना देता है।

श्री गुरूगीताजी में आया हैः

                 गुरूमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा।

                  दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरूपुत्रके।।

जिसके मुख में गुरूमंत्र है उसके सब कर्म सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं। दीक्षा के कारण शिष्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

श्रीमद्भागवत में आता हैः

भगवान का नाम चाहे जैसे लिया जाये - किसी बात का संकेत करने के लिए, हँसी करने के लिए अथवा तिरस्कार-पूर्वक ही क्यों न हो, वह संपूर्ण पापों को नाश करनेवाला होता है। भगवान के नाम की महिमा अनंत है और यदि वही भगवन्नाम मंत्र के रूप मे हमें गुरू के मुख से मिले और हम उस मंत्र का गुरू के निर्देशानुसार अनुष्ठान करें तो वह मंत्र हमें विश्वेश्वर से मुलाकात करवाने में भी सहयोगी होता है।

यदि वह मंत्र का अर्थ या अनुष्ठान की विधि नहीं जानता तो फिर फोन के रौंग नं की तरह उसके जप से उत्पन्न हुई आध्यात्मिक शक्तियाँ बिखर जाती हैं। इसलिए यदि आप अपने जीवन को तेजस्वी-ओजस्वी और हर क्षेत्र में सफल बनाना चाहते हो तो इस नवरात्रि पर सद्गुरू से प्राप्त सारस्वत्य मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करें।

नवरात्र में सारस्वत्य मंत्र का अनुष्ठान करने से ज्ञान तथा प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है। सारस्वत्य मंत्र के जप से स्मृतिशक्ति का आशातीत विकास होता है।

   नवरात्र में करने योग्य सारस्वत्य मंत्र के अनुष्ठान की विधिः 

1.         सारस्वत्य मंत्र का अनुष्ठान सात दिन का होता है।

2.         इसमें प्रतिदिन 170 माला करने का विधान है।

3.         सात दिन तक केवल श्वेत वस्त्र ही पहनने चाहिए।

4.         सात दिन तक भोजन भी बिना नमक का करना चाहिए। दूध-चावल की खीर बनाकर खाना चाहिए।

5.         श्वेत पुष्पों से सरस्वती देवी की पूजा करने के बाद जप करें।देवी को भोग भी खीर का ही लगायें।

6.         माँ सरस्वती से शुद्ध बुद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

7.         स्फटिक के मोतियों की माला से जप करना ज्यादा लाभदायी होता है।

8.     प्रतिदिन एक ही स्थान पर बैठना बहुत लाभदायक है| अतः अपना साधना कक्ष अलग रखे तथा| उस स्थान पर संसार का कोई भी कार्य या वार्तालाप  करें| उस कक्ष या कोने को धूप-अगरबत्ती से सुगंधित रखें| इष्ट अथवा गुरुदेव की छवि के समक्ष सुगंधित पुष्प चढ़ायें और दीपक जलायें । एक ही छवि पर ध्यान केन्द्रित करें| जब आप ऐसे करेंगे तो उससे जो शक्तिशाली स्पन्दन उठेंगे, वे उस वातावरण में ओतप्रोत हो जायेंगे |

9.  सबसे उत्तम समय प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त और संध्या के समय(दोपहर 12 बजे के आसपास  सांय सूर्यास्त के समय का संध्याकाल) हैं | प्रतिदिन निश्चित समय पर जप करने से बहुत लाभ होता है |

 

10. जप पर दिशा का भी प्रभाव पड़ता है |

यदि जप करते समय आपका मुख उत्तर अथवा पूर्व की ओर होगा तो इससे जप में बहुत लाभ होगा।

 

  

         

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