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नरक चतुर्दशीः मंत्र सिद्धि दिवस

नरक चतुर्दशी (कालीचौदस) की रात्रि को जप करने से लक्ष्मी जी होती है प्रसन्न यह रात्रि मंत्रजापको के लिए वरदानस्वरुप है । इस रात्रि में सरसों के तेल अथवा घी के दीये से काजल बनाना चाहिए । इस काजल को बच्चों के आखों में आँजने से विशेष लाभ होता है । बच्चों व बङों को भूत-प्रेत और नजर लगने से बचाने के लिए भी यह काजल उपयोगी है ।

कुबेर ने भगवती महालक्ष्मी के जिस मंत्र से उनकी उपासना करके परम ऐश्वर्य प्राप्त किया , उसी मंत्र के प्रभाव से दक्षसावर्णि मनु को बहुत ऊँचा पद मिला तथा राजा मंगल और प्रियव्रत को भी संपदा, सामर्थ्य एवं यश प्राप्त हुआ । ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद और राजा केदार को भी उसी मंत्र से अखंड संपदा मिली।

उस मंत्र को यदि कोई नरक चतुर्दशी की रात्रि में जपता है तो लक्ष्मीजी उस पर प्रसन्न होती हैं। इससे जापक के हृदय में जो ऐश्वर्य-सामर्थ्य लाने की योग्यता का केन्द्र है वह विकसित होता है।

       श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा ।

      कुछ मंत्र ऐसे होते हैं जिनका अर्थ समझ में नहीं आता किंतु उनके उच्चारण से शरीर के सूक्ष्म केन्द्र प्रभावित होकर ब्रह्मांड के अंदर जो अथाह रहस्य छुपे हैं उनसे तादाम्य कर पाते हैं।

      जिनके पास विवेक है वे ॐ नमो भाग्यलक्ष्म्यै च विद्महे।अष्टलक्ष्म्यै च धीमहि ।तन्नो लक्ष्मीःप्रचोदयात् । या श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा । का जप करके बाहर की लक्ष्मी नहीं चाहते । वे तो केवल परमात्मा को चाहते हैं।

      संपदाप्राप्ति की इच्छावाले संपदाप्राप्ति के लिए और परमात्मप्राप्ति की इच्छावाले परमात्माप्राप्ति के लिए नरक चतुर्दशी की रात्रि में श्रद्धा-तत्परता से विधिवत् जप करें ।

 

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