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शिष्य कैसा होना चाहिए ?

शिष्य कैसा होना चाहिए ?

एक दिन समर्थ रामदास ने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए अपने बाल खोल दिये, माथे पर बहुत सारा कुमकुम डाल दिया, आँखों में खूब काजल लगा लिया और हाथ में तलवार ले ली तथा "हटो-हटो, मैं ब्रह्मपिचाश हूँ ।" 

कहते हुए चलने लगे । यह देख जो लल्लू-पंजू शिष्य थे, वे डरकर भागने लगे किंतु कल्याण ने सोचा कि 'मेरे ब्रह्मज्ञानी गुरु और ब्रह्मपिशाच !मैंने तो सर झुका दिया है, अब वे ब्रह्मपिशाच के रूप में दिखें कि किसी भी रूप में दिखें, हैं मेरे गुरु ।'


कल्याण नजदीक आने लगा । तब समर्थ ने बड़ी-बड़ी आँखें दिखाते हुए कहा : "मारूँगा ...!"


कल्याण डरे नहीं, जा के चरणों में पड़ गये । समर्थ ने  तलवार  फेंक दी और कल्याण को गले लगा लिया कि "अब तू कल्याणस्वरूप हुआ ।।मुझे ऐसा निर्भय शिष्य चाहिए ।" 


'शिष्य को धैर्यवान और दृढ़व्रती होना चाहिए ।'

आप अपने मन को शिष्य बनाइये, अपने विचारों को दृढ़ बनाइये । ईश्वर के रास्ते जाने में थोड़ी-बहुत रुकावट या घबराहट की बातें आयें तो उनको हटा दीजिये और ईश्वर की ओर प्रीतिपूर्वक आगे बढ़िये । ईश्वर का, गुरु का रूप क्रूर या भयंकर भले दिखता हो, पर वह दिखनेभर को ही है । अंदर तो गुरु को खूब प्रेम है । भक्त का उद्धार करने के लिए ही भगवान की गुरु की यह लीला है ।
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