जानिए सगर्भावस्था के दौरान गर्भिणी का आचरण
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जानिए सगर्भावस्था के दौरान गर्भिणी का आचरण

* दिन में नींद व देर रात तक जागरण न करे। दोपहर में विश्रांति ले, गहरी नींद वर्जित है।

* सीधे व घुटने मोड़कर न सोये अपितु करवट बदल-बदलकर सोये।

* सख्त व टेढ़े स्थान पर बैठना, पैर फैलाकर और झुककर ज्यादा समय बैठना वर्जित है।

* गर्भिणी अपानवायु, मल, मूत्र, डकार, छींक, प्यास, भूख, निद्रा, खाँसी, आयासजन्य श्वास, जम्हाई, अश्रु इन स्वाभाविक वेगों को न रोके तथा यत्नपूर्वक वेगों को उत्पन्न न करे।

* इस काल में समागम सर्वथा वर्जित है।

* सुबह की शुद्ध हवा में टहलना लाभप्रद है।

* आयुर्वेदानुसार 9 मास तक प्रवास वर्जित है।

* चुस्त व गहरे रंग के कपड़े न पहने।

* अप्रिय बात न सुने व वाद-विवाद में न पड़े। जोर से न बोले और गुस्सा न करे। मन में उद्वेग उत्पन्न करने वाले वीभत्स दृश्य, टीवी सीरियल न देखे व ऐसे साहित्य, नॉवेल आदि भी पढ़े-सुने नहीं। तीव्र ध्वनि एवं रेडियो भी न सुने।

* दुर्गन्धयुक्त स्थान पर न रहे तथा इमली के वृक्ष के नजदीक न जाय।

* मैले, अपवित्र, विकृत व्यक्ति को स्पर्श न करे।

* शरीर के समस्त अंगों को सौम्य कसरत मिले इस प्रकार के घर के कामकाज करते रहना गर्भिणी के लिए अति उत्तम होता है।

* सगर्भावस्था में प्राणवायु की आवश्यकता अधिक होती है अतः दीर्घ श्वसन (दीर्घ श्वास) वह हलके प्राणायाम का अभ्यास करे। पवित्र, कल्याणकारी, आरोग्यदायक भगवन्नाम-जप करे।

* मन को शांत व शरीर को तनावरहित रखने के लिए प्रतिदिन थोड़ा समय शवासन (शव की नाईं पड़े रहना) का अभ्यास अवश्य करे।

* शांति होम एवं मंगल कर्म करे। देवता, ब्राह्मण, वृद्ध एवं गुरुजनों को प्रणाम करे।

* भय, शोक, चिंता, क्रोध को त्यागकर नित्य आनंदित व प्रसन्न रहे। 

ऊपर दी गयी सावधानियों का गर्भ व मन से गहरा संबंध होता है। अतः गर्भिणी दिये गये निर्देशों के अनुसार अपनी दिनचर्या निर्धारित करे।

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