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भारतीय दम्पत्ति सर्वाधिक सुखी व संतुष्ट क्यों
भारतीय दम्पत्ति सर्वाधिक सुखी व संतुष्ट क्यों

 

 

सनातन संस्कृति के दिव्य संस्कारों का प्रभाव देख चकित हुए विश्लेषक

 

कुछ समय पहले मनोवैज्ञानिकों ने ʹप्लेनेट प्रोजेक्टʹ के अऩ्तर्गत इंटरनेट के माध्यम से विश्व भर के दम्पत्तियों के वैवाहिक जीवन का सर्वेक्षण किया । सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य था ʹकिस देश के पती-पत्नी एक दूसरे से संतुष्ट हैं ?ʹ

लम्बी जाँच के बाद जब निष्कर्ष निकाला गया तो विश्लेषक यह देखकर चकित रह गये कि विश्व के 250 देशों में से भारतीय दम्पत्ति एक-दूसरे से सर्वाधिक सुखी व संतुष्ट हैं । अन्य देशों में ऐसा देखने को नहीं मिला ʹवहाँ के दम्पत्ति अपने जीवन-साथी में कुछ-न-कुछ बदलाव अवश्य लाना चाहते हैं ।

भारतीय संस्कृति उच्छृंखलता को निषिद्ध करके सुसंस्कारिता को प्राथमिकता देती है । दूसरे देशों में प्रायः ऐसा नहीं है । यूरोप में तो स्वतन्त्रता के नाम पर पशुता का तांडव हो रहा है । एक दिन में तीन पति बदलने वाली औरतें भी अमेरिका जैसे देश में मिल जाती हैं ।

यूरोप के कई देशों में तो शादी को मुसीबत माना गया है तथा यौन स्वेच्छाचार को वैध माना जाता है जबकि भारतीय संस्कृति में अपनी पत्नी के साथ शास्त्रानुकूल शारीरिक संबंध ही वैध माना जाता है । अन्य स्थितियों में इसे क्षणिक मजे के लिए स्नायविक शक्ति का ह्रास करने वाला मूर्खतापूर्ण कार्य कहा गया है ।

भारत के ऋषि-मुनियों ने सत्शास्त्रों के रूप में अपने भावी संतानों के लिए दिव्य ज्ञान धरोहर के रूप में रख छोड़ा है तथा इस कलियुग में भी ब्रह्मवेत्ता संत नगर-नगर जाकर समाज में चरित्र, पवित्रता, ध्यात्मिकता एवं कर्तव्यपरायणता के सुसंस्कार सींच रहे हैं ।

इसी का यह शुभ परिणाम है कि पाश्चात्य अपसंस्कृति के आक्रमण के बावजूद भी ऋषि-मुनियों का ज्ञान भारतवासियों के चरित्र एवं संस्कारों की रक्षा कर रहा है तथा इन्हीं संस्कारों के कारण वे सुखी एवं संतुष्ट जीवन जी रहे हैं ।

समाज में इतनी उच्छृंखलता, मनमुखता एवं पशुता का खुला प्रचार होते हुए भी दुनिया के 250 देशों का सर्वेक्षण करने वालों ने पाया कि हिन्दुस्तान का दाम्पत्य जीवन सर्वश्रेष्ठ एवं संतुष्ट जीवन है । यह भारतीय संस्कृति के दिव्य ज्ञान एवं ऋषि-मुनियों के पवित्र मनोविज्ञान का प्रभाव है ।

रामायण, महाभारत एवं मनुस्मृति व मानवता का प्रभाव ही तो है कि आज भी सर्वेक्षण करने वाले प्लेनेट प्रोजेक्टरों को 250 देशों में केवल भारतीय दम्पत्तियों को ही परस्पर सुखी, संतुष्ट एवं श्रेष्ठ कहना पड़ा । धन्य है भारत की संस्कृति !

 

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